Court Orders: 15 साल से नहीं बने दिल्ली स्कूल ट्रिब्यूनल के लिए नियम, हाईकोर्ट ने एलजी और सरकार को दिए निर्देश
दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली स्कूल एजुकेशन एक्ट, 1973 के तहत दिल्ली स्कूल ट्रिब्यूनल के आदेशों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए आवश्यक नियम बनाने या कोई अन्य तंत्र विकसित करने का निर्देश दिया है। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की बेंच ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल के आदेशों की अनुपालना सुनिश्चित करने के लिए कोई ठोस व्यवस्था न होने से कर्मचारियों को न्याय मिलने में बाधा आ रही है। कोर्ट ने दिल्ली के उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वे याचिका में उठाए गए मुद्दों पर विचार करें और धारा 28 के तहत नियम बनाकर या अन्य कानूनी तरीके से ट्रिब्यूनल को आदेश लागू करने का अधिकार दें। यदि नियमों में संशोधन की जरूरत हो तो केंद्र सरकार तुरंत इस पर विचार करे। पूरी प्रक्रिया तीन महीने में पूरी करने का आदेश दिया गया है। याचिका जस्टिस फॉर ऑल नामक संगठन की ओर से दाखिल की गई थी, जिसमें दिल्ली के निजी स्कूलों में काम करने वाले कर्मचारियों के सेवा संबंधी मामलों में ट्रिब्यूनल के फैसलों को लागू कराने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता के वकील खगेश झा ने तर्क दिया कि एक्ट की धारा 8, 11 और 27 के बावजूद ट्रिब्यूनल के आदेशों को लागू करने का कोई प्रभावी तंत्र नहीं है। उन्होंने 2010 के फुल बेंच फैसले का हवाला दिया, जिसमें भी नियम बनाने की सिफारिश की गई थी, लेकिन 15 साल बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दिल्ली स्कूल एजुकेशन एक्ट का उद्देश्य स्कूल शिक्षा को बेहतर बनाना है, लेकिन ट्रिब्यूनल के आदेशों की अनुपालना न होने से कर्मचारियों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। धारा 27 में मैनेजर पर दंड का प्रावधान है, लेकिन यह आदेशों को लागू करने का पर्याप्त माध्यम नहीं है। कोर्ट ने जीएनसीटीडी के वकील समीर वशिष्ठ के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि धारा 20 के तहत स्कूल प्रबंधन को अपने कब्जे में लेना कोई स्थायी समाधान नहीं है, क्योंकि यह प्रशासक की मर्जी पर निर्भर करता है। ट्रिब्यूनल के आदेशों को लागू करने के लिए नियम बनाने की जरूरत फैसले में 2010 के केस प्रेसाइडिंग ऑफिसर दिल्ली स्कूल ट्रिब्यूनल बनाम जीएनसीटीडी के पैराग्राफ 35-37 का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल के आदेशों को लागू करने के लिए नियम बनाने की जरूरत है, ताकि कर्मचारियों को वास्तविक राहत मिल सके। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रिब्यूनल कोई सामान्य अदालत नहीं है, इसलिए उसे केवल कानून के दायरे में ही कार्य करने की अनुमति है। वर्तमान में ट्रिब्यूनल द्वारा एक्जीक्यूशन पिटीशन सुनना भी कानूनी रूप से वैध नहीं है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Jan 21, 2026, 03:07 IST
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