इंदौर की गेर: राजवाड़े के ईर्द-गिर्द होने वाला आयोजन कैसे बना इंदौर की पहचान, रोचक रहा है इंदौरी गेर का इतिहास

मालवा का शहर जिसकी महक और उत्सवी परंपरा का प्राचीन इतिहास रहा है। होली-रंगपंचमी या गणेश उत्सव झांकियों की चर्चा देश भर में होती है। गैर शब्द का अर्थ दूसरा या पराया होता है, लेकिन उसे भी रंग लगाना ही इंदौर में रंगपंचमी पर निकलने वाली गेर का उद्देश्य होता है। रविवार को इंदौर में रंगारंग गेरें निकाली जाएंगी और इसमें शामिल होने वाला हर शख्स रंग में डूबा और भीगा रहेगा। रंगपंचमी का आयोजन रियासत दौर में राजवाड़े के आसपास ही होता था, लेकिन धीरे-धीरे इसका स्वरूप विस्तृत होता गया। महाराजा डालते थे रंग होलकर रियासत काल में रंग पंचमी महोत्सव बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता था। वन विभाग एक महीने पहले से रंग पंचमी के लिए प्राकृतिक फूलों का संग्रह कर रंग बनाने का कार्य करता था। सर्वप्रथम महाराजा होलकर दरबार में अपने दरबारियों पर रंग-गुलाल डालते थे। रंग पंचमी के अवसर पर गीत-संगीत के भव्य आयोजन और पशुओं की लड़ाई मुख्य आकर्षण का केंद्र हुआ करती थी। शहर के कई अखाड़ों में इस दौरान पहलवानों के मध्य कुश्ती के आयोजन भी होते थे, राजवाड़ा रंगपचमी के उत्सव का मुख्य केंद्र होता था। होलकर कालीन प्रकाशित गजेटियर और अन्य पुस्तकों में उल्लेख है कि होली और रंगपंचमी का आयोजन सभी लोग मिलकर करते थे। राजवाड़े में राजपरिवार के सदस्य चांदी और अन्य दरबारी पीतल और तांबे की पिचकारियों से होली खेलते थे।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Mar 06, 2026, 23:34 IST
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