हसदेव अरण्य बचाओ: केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक का विरोध तेज, पूर्व डिप्टी सीएम ने की मंजूरी रोकने की मांग

हसदेव अरण्य क्षेत्र मेंप्रस्तावित केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक को लेकर विरोध फिर तेज हो गया है। पूर्व विधायक भानुप्रताप सिंह ने केंद्रीय वन सलाहकार समिति और राज्यपाल को पत्र भेजा है। उन्होंने परियोजना के लिए चिह्नित प्रतिपूर्ति वनीकरण भूमि पर आपत्ति दर्ज कराई है। केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वन सलाहकार समिति की बैठक आज 8 मई 2026 को होनी है। इस बैठक में राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को आवंटित तथा अदाणी समूह के एमडीओ वाले इस कोल ब्लॉक को वन स्वीकृति देने के प्रस्ताव पर विचार किया जाना है। बैठक से पहले पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंह देव ने समिति सदस्यों से फोन पर चर्चा की। उन्होंने ईमेल और वाट्सएप के जरिए दस्तावेज भेजते हुए परियोजना को मंजूरी नहीं देने का आग्रह किया है। भानुप्रताप सिंह ने आजशुक्रवार को प्रेसवार्ता में हसदेव बचाओ संघर्ष समिति के पदाधिकारियों के साथ यह मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि 1742.60 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्सन प्रस्ताव पर विचार होगा। परियोजना के प्रतिपूर्ति वनीकरण के लिए बलरामपुर, सरगुजा और मनेंद्रगढ़ जिलों की 3363.946 हेक्टेयर वन भूमि चिह्नित की गई है। आरोप है कि यह भूमि स्थानीय आदिवासियों के निस्तार, लघु वनोपज संग्रहण और खेती का आधार है। वन अधिकार मान्यता अधिनियम 2006 के तहत निवासियों के दावे लंबित हैं। आदिवासी हितों पर आपत्ति भानुप्रताप सिंह ने कहा कि वन भूमि को वनीकरण के लिए चिह्नित करना आदिवासी हितों के विपरीत है। उन्होंने पत्र में उल्लेख किया कि पहले भी पीईकेबी और परसा कोल ब्लॉक परियोजनाओं के लिए इन्हीं जिलों की वन भूमि आवंटित हुई है। साथ ही, पिछले कुछ महीनों से वन विभाग द्वारा परंपरागत वन निवासियों को बेदखली नोटिस दिए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि खनन से आदिवासियों को विस्थापित किया जा रहा है। प्रतिपूर्ति वनीकरण के नाम पर भी उनकी जमीन छीनी जा रही है। उन्होंने समिति से चिह्नित वन भूमि को निरस्त करने तथा परियोजना को वन स्वीकृति नहीं देने की मांग की है। पूर्व उपमुख्यमंत्री का हस्तक्षेप टीएस सिंह देव ने कहा कि प्रस्तावित खनन से लगभग सात लाख पेड़ों की कटाई होगी। यह क्षेत्र घने जंगल, जैव विविधता, हसदेव नदी और बांगो जलाशय के लिए महत्वपूर्ण है। खनन से पर्यावरणीय संतुलन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने समिति का ध्यान ऐतिहासिक रामगढ़ पहाड़ियों की ओर आकर्षित किया। खनन गतिविधियों से क्षेत्र में दरारें आने लगी है। रामगढ़ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षित स्मारकों में शामिल है। सिंह देव ने आरोप लगाया कि परियोजना रिपोर्ट में रामगढ़ पहाड़ियों की दूरी वास्तविकता से अधिक है। उन्होंने भारतीय वन्यजीव संस्थान की 2021 की रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें केते एक्सटेंशन को नो-गो एरिया घोषित करने की सिफारिश थी। ईसीएफआरई की रिपोर्ट ने चोरनाई वाटरशेड क्षेत्र में खनन पर रोक का सुझाव दिया था, जिसका 90 फीसदी हिस्सा इस ब्लॉक में आता है। यह इलाका हाथियों के आवास क्षेत्र और लेमरू हाथी अभयारण्य के बफर जोन में है, जहां मानव-हाथी संघर्ष बढ़ा है। छत्तीसगढ़ विधानसभा ने 2022 में नई कोयला खदानों का विरोध करते हुए प्रस्ताव पारित किया था। सुप्रीम कोर्ट में भी वर्तमान खदान में 20 वर्षों का कोयला भंडार पर्याप्त बताया गया है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: May 08, 2026, 16:47 IST
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