'ये सरासर मूर्खता': विपक्ष के किस कदम पर भड़के हरीश साल्वे? बोले- अदालत को हथियार बना रहा इंडिया ब्लॉक
देश के जाने-माने वकील और भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से मिलने की कोशिश और विपक्ष के विरोध प्रदर्शन को लेकर तीखी टिप्पणी की है। आईएएनएस को दिए इंटरव्यू में उन्होंने विपक्ष के इस कदम को सरासर मूर्खता बताते हुए आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के तौर पर किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि संविधान अधिकार देता है, लेकिन उनका इस्तेमाल कानून और संवैधानिक मर्यादाओं के दायरे में रहकर ही किया जाना चाहिए। सीजेआई से मिलने की कोशिश पर उठाए सवाल हरीश साल्वे ने कहा कि इंडिया ब्लॉक के नेताओं के पास कई वरिष्ठ वकील हैं। ऐसे में उन्हें समझना चाहिए कि मुख्य न्यायाधीश हर मामले की खुद सुनवाई नहीं करते। सीजेआई जिस पीठ को मामला सौंपते हैं, वही उस पर सुनवाई करके फैसला देती है। अगर विपक्ष संविधान में विश्वास करने की बात करता है, तो उसे न्यायपालिका के सामने राजनीतिक मांगें रखने के बजाय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। उनके मुताबिक, इस तरह सीजेआई से मिलने की कोशिश करना समझ से परे है। अदालत के फैसले से असहमति का मतलब न्यायपालिका पर अविश्वास नहीं साल्वे ने कहा कि किसी फैसले से असहमत होना और पूरी न्यायपालिका पर भरोसा नहीं होने की बात कहना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। अदालत का फैसला पसंद नहीं आने पर उसकी आलोचना की जा सकती है और उसके खिलाफ कानूनी तर्क भी रखे जा सकते हैं, लेकिन इससे न्यायिक व्यवस्था पर सवाल उठाना उचित नहीं है। पहले वकीलों को यह सिखाया जाता था कि अदालत में चल रहे मामले पर सार्वजनिक टिप्पणी करने से बचना चाहिए। अब राजनीतिक रंग ले चुके मामलों में यह परंपरा कमजोर होती दिख रही है। उनके मुताबिक, जब किसी पक्ष को मनचाहा फैसला नहीं मिलता, तो वह न्यायपालिका पर भरोसा कम होने की बात करने लगता है। यह देश के भविष्य के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। 'विरोध का अधिकार है, लेकिन कानून तोड़ने की छूट नहीं' विरोध प्रदर्शन के अधिकार पर साल्वे ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मिले अधिकारों का इस्तेमाल कानून के दायरे में रहकर ही किया जा सकता है। अगर पुलिस प्रदर्शन की अनुमति नहीं देती है, तो उसके फैसले को उचित कानूनी प्रक्रिया के जरिए अदालत में चुनौती दी जा सकती है। कोई व्यक्ति खुद ही पुलिस के आदेश को गलत मानकर प्रतिबंध तोड़ नहीं सकता और फिर रोके जाने पर अपने अधिकारों के उल्लंघन का दावा नहीं कर सकता। उनके मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि विरोध प्रदर्शन का अधिकार किसी को कानून से ऊपर नहीं बनाता। मुख्य चुनाव आयुक्त के मामले में प्रक्रिया का पालन जरूरी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े विवाद पर साल्वे ने कहा कि इस मामले में जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालने की जरूरत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा है और संबंधित रिकॉर्ड की जांच के बाद ही मामले पर फैसला होगा। अगर किसी तरह की अनियमितता सामने आती है, तो उसके अनुसार संवैधानिक प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से नहीं हटा सकता। साल्वे ने यह भी कहा कि राजनीतिक विवाद खड़ा करने के बजाय अदालत की सुनवाई और उसके फैसले का इंतजार करना चाहिए। ये भी पढ़ें:इंडिया ब्लॉक के नेताओं से मुलाकात नहीं करेंगे सीजेआई, बताई ये वजह, एसआईआर विवाद से क्या है कनेक्शन संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करना लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह साल्वे ने कहा कि देश में सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान और उनकी मजबूती बनी रहनी चाहिए। न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका और चुनाव आयोग की अपनी-अपनी जिम्मेदारियां हैं। लोकतंत्र तभी सही तरीके से काम कर सकता है, जब इन संस्थाओं की भूमिका और अधिकारों का सम्मान किया जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा विरोध प्रदर्शनों के पीछे विदेशी फंडिंग और बाहरी हस्तक्षेप हो सकता है। उन्होंने नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश की घटनाओं का भी जिक्र किया। हालांकि, विदेशी फंडिंग और बाहरी ताकतों से जुड़े ये उनके आरोप हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि इंटरव्यू में नहीं की गई। साल्वे ने कहा कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह संवैधानिक संस्थाओं की रक्षा करे और कानून के उल्लंघन से निपटे। उन्होंने जोर दिया कि अधिकारों के साथ जिम्मेदारियां भी आती हैं और लोकतंत्र में किसी को भी कानून से ऊपर नहीं समझा जाना चाहिए।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Oct 12, 2026, 07:42 IST
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