होर्मुज और अंधेरा: ...प्रेतयोनि में चले गए पुराने बंदरगाह, जहां कभी सोना गिना जाता था, वहां आज घास उगती है!
अमेरिका-ईरान की जंग जारी है। होर्मुज जलडमरूमध्य पिछले नब्बे दिनों से अंधेरे में है। दुनिया का लगभग 20 फीसदी तेल जिस रास्ते से गुजरता था, वहां अब बारूद गुजर रहा है। तेल फिर खौल रहा है। बीमा कंपनियां जहाजों को कवर करने से हिचक रही हैं। लेकिन दुनिया रुकती नहीं। व्यापार ने अपना थैला उठाया और नए रास्ते तलाश लिए। सऊदी अरब ने यानबू पाइपलाइन पर भरोसा बढ़ाया। संयुक्त अरब अमीरात फुजैरा से तेल भेज रहा है, बिना होर्मुज के। तुर्किये का जेहान, पाकिस्तान का ग्वादर, म्यांमार का क्याउकफ्यू, कजाकिस्तान का खोर्गोस और रूस का सबेत्ता नई रोशनियों की तरह उभर रहे हैं। जब व्यापार रास्ता बदलता है तो पीछे सिर्फ इतिहास छोड़ता है। पुराने बंदरगाह प्रेतयोनि में चले जाते हैं। जहां कभी दुनिया का सोना गिना जाता था, वहां घास उगने लगती है। कौन जाने, होर्मुज भी उसी राह पर हो। टाइम मशीन के यात्रियो, आइए अपनी सीट पर बैठिए। हम उन शहरों की यात्रा पर चलते हैं, जिन्होंने कभी दुनिया का व्यापार संभाला, लेकिन एक नया रास्ता खुलते ही इतिहास की धूल में दब गए। पहला पड़ाव है पहली सदी ईसा पूर्व का पेट्रा। आज का जॉर्डन। टाइम मशीन एक संकरी घाटी सिक में उतर रही है। दोनों तरफ लगभग अस्सी मीटर ऊंची गुलाबी चट्टानें हैं। सामने चट्टानों में तराशी गई प्रसिद्ध ट्रेजरी दिखाई देती है। तीस हजार लोग चट्टानों के भीतर बने घरों में रहते हैं। अरब से आने वाला हर ऊंट लोबान और मुर्र लेकर यहीं पहुंचता है। रोम के मंदिरों को लोबान चाहिए, मिस्र की ममियों के लिए मुर्र। हर ऊंट पर टैक्स लगता है और उसी टैक्स से रेगिस्तान में पानी की पाइपलाइन बिछाई गई है। पेट्रा उस दौर का चमत्कार है। फिर समय का पहिया घूमता है। रोमनों ने समुद्री रास्ता खोज लिया। जहाज सीधे चलने लगे। ऊंटों की जरूरत खत्म हुई। पेट्रा का टैक्स खत्म हुआ। 363 ईस्वी के भूकंप ने पानी की व्यवस्था तोड़ दी और पेट्रा दुनिया की नजरों से गायब हो गया। सदियों तक किसी को याद नहीं रहा कि यहां कभी एक समृद्ध शहर था। 1812 में स्विस खोजी योहान बर्कहार्ट अरब वेश में यहां पहुंचा और दुनिया को बताया कि रेगिस्तान के भीतर एक खोया हुआ शहर सो रहा है। अब टाइम मशीन अफ्रीका की ओर बढ़ती है। चौदहवीं सदी का टिंबकटू। सहारा के दक्षिणी किनारे पर चमकता हुआ शहर। दक्षिण से सोना आता है, उत्तर से नमक। दोनों की बराबर कीमत यहीं तय होती है। यह मनसा मूसा का शहर है। वही मनसा मूसा, जिसने 1324 की हज यात्रा में काहिरा में इतना सोना बांटा कि मिस्र की अर्थव्यवस्था वर्षों तक प्रभावित रही। यहां सांकोर विश्वविद्यालय में पच्चीस हजार छात्र पढ़ते हैं, जब ऑक्सफोर्ड का वैभव अभी दूर था। लेकिन फिर यूरोपीय जहाज पश्चिम अफ्रीका के तट तक पहुंच गए। सोना सीधे समुद्र से जाने लगा। ऊंटों के कारवां खत्म हुए। व्यापार समुद्र की ओर मुड़ गया। आज अंग्रेजी में 'टिंबकटू' का मतलब है। दुनिया के बीच कहीं नहीं। जो शहर कभी दुनिया के व्यापार का केंद्र था, वही दुनिया से गायब होने का प्रतीक बन गया। अब हम पंद्रहवीं सदी के वेनिस में हैं। आठ सौ वर्षों तक यह शहर एशिया और यूरोप के बीच मसालों का सबसे बड़ा द्वार रहा। मार्को पोलो यहीं से चीन के लिए निकला था। लेकिन 1498 में वास्को द गामा अफ्रीका का चक्कर लगाकर सीधे कालीकट पहुंच गया। एक समुद्री रास्ते ने पूरे व्यापारिक संतुलन को बदल दिया। वेनिस का एकाधिकार टूट गया। अगले दो सौ वर्षों में उसका वैभव खत्म हो गया। 1797 में नेपोलियन ने उसके गणराज्य का अंत कर दिया। आज वहां करोड़ों पर्यटक तस्वीरें खिंचवाते हैं, लेकिन शायद ही कोई याद करता है कि यह कभी दुनिया की सबसे ताकतवर व्यापारिक राजधानी थी। इसी दौर में एक और शहर था ब्रुज। उत्तरी यूरोप का सबसे अमीर व्यापारिक नगर। ज्विन नहर इसे उत्तरी सागर से जोड़ती थी। हर जहाज यहीं आता था। फिर नहर में गाद भर गई। जहाज नहीं आ सके। व्यापार नब्बे किलोमीटर दूर एंटवर्प चला गया। ब्रुज में बाजार सूने हो गए, नहरें सड़ने लगीं और शहर भूत की तरह खड़ा रह गया। 1892 में जॉर्जेस रोडेनबाख ने उपन्यास लिखा कि 'ब्रुज ला मोर्त', यानी 'मृत ब्रुज'। दुनिया को तब याद आया कि यहां कभी जीवन भी था। टाइम मशीन अब बीसवीं सदी के मोइनाक पहुंचती है। अरल सागर के किनारे बसा सोवियत संघ का मछली उद्योग का बड़ा केंद्र। यहां से डिब्बाबंद मछलियां पूरे सोवियत संघ में भेजी जाती थीं। फिर फैसला हुआ कि कपास उगाई जाएगी। नदियों का पानी मोड़ दिया गया। अरल सागर सिकुड़कर लगभग खत्म हो गया। मोइनाक समुद्र से सौ किलोमीटर दूर छूट गया। जहाज रेत पर खड़े रह गए। बंदरगाह बचा, लेकिन पानी चला गया। अब सबसे अहम पड़ाव। यमन का अदन। 1839 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने यहां कब्जा किया। उस समय यह सिर्फ मछुआरों का छोटा गांव था। 1869 में स्वेज नहर खुली और अदन दुनिया के सबसे बड़े बंकरिंग बंदरगाहों में बदल गया। हर जहाज यहां ईंधन भरता था। होटल बने, ओपेरा हाउस खुले, लेखक और व्यापारी यहां ठहरने लगे। ब्रिटेन ने इसे 'स्वेज के पूर्व का सबसे कीमती स्थान' कहा। 1950 तक अदन हिंद महासागर का सबसे समृद्ध शहर था। इसी शहर में एक गुजराती युवक ट्रेडिंग कंपनी में क्लर्क था। उसका नाम धीरुभाई अंबानी था। फिर जून 1967 आया। छह दिन के युद्ध में मिस्र ने स्वेज नहर बंद कर दी। जहाजों ने केप ऑफ गुड होप का रास्ता पकड़ लिया। अदन का कारोबार रातोंरात खाली हो गया। उसी वर्ष ब्रिटेन भी चला गया। गृहयुद्ध शुरू हुआ। 1975 में स्वेज नहर दोबारा खुली, लेकिन अदन वापस नहीं लौटा। आठ साल में दुनिया ने नए रास्ते बना लिए थे। सिंगापुर, जेद्दा और जिबूती ने उसका कारोबार बांट लिया। जब पुराना दरवाजा खुला तो पीछे कोई इंतजार नहीं कर रहा था। अदन ने भारत के सबसे अमीर उद्योगपति की कहानी शुरू की, लेकिन खुद इतिहास बन गया। टाइम मशीन अब फिर वर्तमान में लौट रही है। फुजैरा के तट पर। होर्मुज पिछले नब्बे दिनों से अंधेरे में है। लेकिन यानबू, फुजैरा, जेहान, क्याउकफ्यू, खोर्गोस और सबेत्ता जैसे नए रास्ते हर दिन उसकी जरूरत कम कर रहे हैं। व्यापार का स्वभाव पानी की तरह है। वह रुकता नहीं, अपना रास्ता बदल लेता है। और जब वह नया रास्ता चुन लेता है, तब पीछे मुड़कर नहीं देखता। बंद जलमार्ग की सबसे बड़ी कीमत हमेशा वही शहर चुकाते हैं, जहां कभी सबसे ज्यादा रोशनी जलती थी।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Aug 02, 2026, 03:04 IST
होर्मुज और अंधेरा: ...प्रेतयोनि में चले गए पुराने बंदरगाह, जहां कभी सोना गिना जाता था, वहां आज घास उगती है! #Opinion #International #HormuzStrait #Iran #UnitedStates #GlobalTrade #OilMarket #Shipping #MiddleEast #Geopolitics #SubahSamachar
