एनसीआर में गड्ढा: जानलेवा गड्ढे में गिरकर इंजीनियर की मौत, एक त्रासदी और व्यवस्था की घनघोर विफलता
एक युवा की मौत हमेशा ही दुखद होती है, लेकिन 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता ने नोएडा के सेक्टर-150 के जानलेवा गड्ढे में गिरकर जिस तरह से जान गंवाई, वह सिर्फ व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि समाज और राज्य की सामूहिक विफलता को भी इंगित करती है। इसे सड़क दुर्घटना कहकर खारिज करना आसान है, लेकिन सच्चाई यह है कि घने कोहरे में कार पर नियंत्रण खोना एक बात है, और नियंत्रण खोने के बाद करीब दो घंटे तक जीवित रहते हुए मौत का इंतजार करने पर मजबूर होना पूरी तरह दूसरी। उल्लेखनीय है कि युवराज मेहता रात के समय कार से अपने घर लौट रहे थे। घने कोहरे की वजह से रास्ता साफ नजर नहीं आ रहा था। उनकी कार सड़क के किनारे पानी से भरे एक गहरे गड्ढे में गिर जाती है, जो एक निर्माणाधीन साइट का हिस्सा था। उन्होंने अपने पिता को फोन कर जान बचा लेने की गुहार भी लगाई। क्षोभ का विषय है कि वहां कोई रिफ्लेक्टर नहीं था, कोई चेतावनी बोर्ड नहीं था, सिर्फ एक कम ऊंचाई की दीवार थी, जो ऐसी दुर्घटनाओं को आमंत्रण देने वाली ही थी। पिता मौके पर पहुंचे, आपदाओं से निपटने वाले बल भी पहुंचे, पर अपर्याप्त संसाधनों के चलते होने वाली देरी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दुर्घनाग्रस्त कार को ढूंढने में तीन दिन लग गए। कुछ ही दिन पहले इसी जगह पर एक ट्रक भी पानी में चला गया था, तब बड़ी मुश्किल से ड्राइवर को बचाया जा सका था। स्थानीय निवासी भी समय-समय पर चेतावनी संकेतों और सुरक्षा के पर्याप्त उपाय न होने की शिकायत करते रहे हैं। इसके बावजूद अगर यह हादसा हुआ है, तो यह महज दुर्घटना नहीं है, बल्कि राज्य की उदासीनता, प्रशासनिक लापरवाही और जवाबदेही की कमी का सीधा नतीजा है। हादसे के बाद, जैसा कि अमूमन ऐसे मामलों में होता है, बिल्डर, अधिकारियों इत्यादि पर कार्रवाइयों और विशेष जांच दल के गठन की औपचारिकता हो रही है, लेकिन सवाल यह है कि शिकायतों पर पहले कार्रवाई क्यों नहीं हुई हमारी व्यवस्थाएं क्या इतनी कमजोर हैं कि एक युवक की पुकार सुनकर भी उसे नहीं बचा सकतीं यह हालत एक्सप्रेसवे व आईटी पार्कों से घिरे नोएडा की है, जो वर्षों से देश के शहरी भविष्य का प्रतीक माना जाता रहा है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए साढ़े आठ हजार करोड़ रुपये से अधिक के बजट के बावजूद अगर हमारी व्यवस्थाएं ऐसी चौपट हैं, जैसी इस मामले में दिखी हैं, तो सवाल तो उठेंगे ही। पिछले साल वडोदरा में गंभीरा नदी पर पुल का ध्वस्त होना हो या फिर इसी महीने इंदौर में दूषित जल का प्रकोप और अब एनसीआर का जानलेवा गड्ढा, ये सभी दरअसल शहरी भारत की उन विडंबनाओं की ओर इशारा करते हैं, जिन पर गौर किए बगैर आखिर हम विकसित भारत के स्वप्न को कैसे पूरा करेंगे
- Source: www.amarujala.com
- Published: Jan 22, 2026, 05:33 IST
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