जेम्स वॉटसन: जीन, जुनून और जीनियस... एक फैसले ने 21वीं सदी का सबसे विवादास्पद बना दिया

जब मैं पहली बार डॉ. वॉटसन से मिला, तो ऐसा लगा, जैसे उनका दिमाग गहरे विचारों के महासागर में तैर रहा हो, और मैं उस विशाल ब्रह्मांड का एक छोटा-सा कण भर हूं। मुझे तुरंत यह एहसास हो गया था कि यह कोई साधारण जगह नहीं, बल्कि ऐसी जगह है, जहां इतिहास लिखा जाता है, और अब मैं भी इसी का हिस्सा बनने जा रहा हूं। वर्ष 1991 का वह दिन आज भी मेरे जेहन में उसी ताजगी और जोश के साथ उभर आता है, जैसा जिंदगी के सबसे खास लम्हों के साथ होता है। कोल्ड स्प्रिंग हार्बर लेबोरेटरी में विज्ञान लेखक के रूप में मेरा पहला दिन था, और मेरे सामने खड़े थे डॉ. जेम्स वॉटसन, जिन्हें मैं कभी-कभी जिमी कहता था। ये वही वॉटसन थे, जिनका नाम फ्रांसिस क्रिक, रॉसलिंड फ्रैंकलिन और मॉरिस विल्किंस के साथ डीएनए की डबल-हेलिक्स संरचना के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज है। उनकी छवि मेरे दिलो-दिमाग में कुछ ऐसी बनी थी कि उनका नाम सुनते ही मेरी धड़कन तेज और शरीर में एक अजीब-सी सिहरन दौड़ जाती थी। उस दिन वह मेरे पास आए। उन्होंने एक तीखी नजर मेरे ऊपर डाली, हाथ मिलाया, और फिर अचानक अपनी निगाह मेरे सिर के ऊपर ले गए। ऐसा लगा, जैसे उनका दिमाग गहरे विचारों के महासागर में तैर रहा हो, और मैं उस विशाल ब्रह्मांड का एक छोटा-सा कण भर हूं। उसी मुलाकात ने मुझे एहसास करा दिया था कि यह कोई साधारण जगह नहीं, बल्कि ऐसी जगह है, जहां इतिहास लिखा जाता है, और अब मैं भी इसी का हिस्सा बनने जा रहा हूं। हालांकि, कोल्ड स्प्रिंग हार्बर में बिताए मेरे चार वर्षों में वॉटसन साहब के साथ कभी मेरी करीबी नहीं रही, लेकिन उनको लेकर मेरे मन में बैठा डर मानो धीरे-धीरे छंटता जा रहा था। मंच की रोशनी से दूर, वह शांत स्वर में बोलने वाले, गहन विचारों में डूबे रहने वाले, मगर एक बेहद जिद्दी इन्सान थे। मेरे कार्यकाल के अंतिम दिनों की एक शाम की स्मृति आज भी बिल्कुल ताजा है। पेड़ों के बीच से छनकर आती धूप और उस धूप में चमकती सुनहरी सड़क पर डॉक्टर साहब। यह उनका रोजाना का काम था, लेकिन आज कुछ अलग ही बात थी। और वह थी उनके हाथ में सूरज की रोशनी में चमचमाती एक किताब, जिसका नाम था द बेल कर्व। यह 1994 में प्रकाशित वही कुख्यात किताब थी, जिसे रिचर्ड हेर्नस्टीन और चार्ल्स मरे द्वारा अमेरिकी समाज की बुद्धिमत्ता के स्तर में अंतर को समझाने, उस अंतर के कुछ परिणामों की चेतावनी देने और बुरे परिणामों को कम करने के लिए सामाजिक नीतियां पेश करने के लिए लिखी गई थी। किताब यह बताने का प्रयास करती थी कि अलग-अलग नस्लीय समूहों के बीच आईक्यू का अंतर आनुवंशिक होता है। उससे पहले मैंने जिमी को निजी या सार्वजनिक रूप से नस्ल पर चर्चा करते नहीं सुना था। लेकिन जैसे-जैसे वक्त बीतता गया, मुझे एहसास हुआ कि उनमें भी एक विचित्र बदलाव आने लगा। वह एकदम शांत थे, पर जितना उन पर चुप रहने का दबाव बढ़ता गया, वह उतना ही और खुलकर बोलने लगे। नस्ल और बुद्धिमत्ता के बीच संबंधों पर उनकी जिद ने न केवल उनकी वैज्ञानिक प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाया, बल्कि उनसे वह ठिकाना भी छीन लिया, जिससे उन्हें सबसे अधिक प्रेम थावही कोल्ड स्प्रिंग हार्बर। विडंबना देखिए कि जिस डीएनए ने जिमी को शिखर पर पहुंचाया और नोबेल जैसा प्रतिष्ठित सम्मान दिलाया, उसी ने उन्हें जमीन पर भी ला पटका। बीते छह नवंबर को दुनिया को अलविदा कहने वाले इस वैज्ञानिक ने अपना पूरा जीवन डीएनए व आणविक जीवविज्ञान की नई खोजों में खपा दिया। उन्हें 20वीं सदी के महानतम वैज्ञानिकों की सूची में शुमार किया गया। लेकिन विभिन्न नस्ल समूहों के बीच आईक्यू की तुलना ने उन्हें 21वीं सदी के सबसे विवादास्पद लोगों में से एक बना दिया। आनुवंशिक नियतिवाद एक ऐसा विचार है, जिसमें यह मान लिया जाता कि जीन ही सब कुछ तय करता है। यह वह विचार है, जिसके शिकार बड़े-बड़े विचारक भी हो जाते हैं। जब कोई वैज्ञानिक कोई असाधारण खोज कर लेता है, तो कभी-कभी उसे भ्रम हो जाता है कि उसने जीवन, बीमारी और समाज, इन सबका अंतिम रहस्य खोज लिया है। और शायद यही डॉ. वॉटसन के साथ भी हुआ। दिलचस्प बात यह है कि 1960-70 के दशक में जब उनके समकालीन वैज्ञानिक नस्ल, बुद्धिमत्ता और आनुवंशिक गुणों पर शोध का समर्थन कर रहे थे, तब जिमी इस बहस से दूर ही रहे, यहां तक कि कोल्ड स्प्रिंग हार्बर के निदेशक बनने के बाद भी। उन्होंने अपने शोध को प्राथमिकता दी, जबकि उनके आसपास यह नई बहस तेजी से बढ़ रही थी। तो फिर सवाल उठता है कि आखिर उनकी जिंदगी में ऐसा कौन-सा मोड़ आया, जिसने उन्हें उन्हीं विचारों के करीब पहुंचा दिया, जिनसे वह पहले पीछे हटते थे! दरअसल, डीएनए के पुनर्संयोजन व अनुक्रमण और मानव जीनोम परियोजना की प्रगति ने वॉटसन के भीतर भी एक नई खिड़की खोल दी। वह भी जीन के एक सुंदर, लेकिन आसान मॉडल से बहुत प्रभावित हुए, जो सब कुछ समझा सकता था। जीन अब उनके लिए सिर्फ अध्ययन का विषय नहीं रहा था, बल्कि उनकी पहचान, अभिमान और निजी जुनून बन चुका था। कोल्ड स्प्रिंग हार्बर के भवनों, मूर्तियों और 65 फुट ऊंचे घंटाघर तक में डीएनए की संरचनाएं उकेरी जाने लगीं, मानो पूरा संस्थान ही उनके जुनून का प्रतिबिंब बन गया। धीरे-धीरे डीएनए उनके निजी जीवन का भी हिस्सा बन गया। जब उनके बड़े बेटे को मानसिक बीमारी (सिजोफ्रेनिया) हुई, तो डॉ. वॉटसन को इस विचार में राहत मिली कि यह जेनेटिक पासे की एक खराब चाल थी। उन्होंने यह विचार आनुवंशिक बीमारी से जूझ रहे अन्य परिवारों से भी साझा किया। असल में दुनिया भर में हजारों परिवार इसी सांत्वना में जीते हैं कि यदि समस्या जीन में है, तो वह किसी की गलती नहीं। यह सोच किसी आधुनिक ज्योतिष की तरह लगती है-एक ऐसी कहानी, जिससे मन को थोड़ी राहत मिल जाती है। वॉटसन ने एक बार कहा भी था कि हम सोचते थे कि हमारी किस्मत हमारे सितारों में है। अब हम काफी हद तक जानते हैं, कि हमारी किस्मत हमारे जीन्स में है। लेकिन जीन के प्रति जुनून इस बात की पूरी वजह नहीं है कि डॉ. वॉटसन को नस्लवादी विचार क्यों पसंद आए। उनके व्यक्तित्व की परतों में कुलीनपंथी सोच, इंग्लैंड प्रेम, यूरोपीय श्रेष्ठता के साथ 1950 के दशक की पितृसत्तात्मक मान्यताओं के प्रति आकर्षण भी था। ऐसे में, जब द बेल कर्व उनके हाथ लगी, तो उसने उनके भीतर पहले से मौजूद सोए हुए तर्कों को चिंगारी दी। और अंत में, वही बड़ा खतरा सामने आया। यह मान लेना कि हम जो कुछ भी हैं, वह हमारे जीन के ही कारण है, अपने-आप में एक डरावना विचार है। अगर आप मानते हैं कि आपकी पहचान सिर्फ एक ही तत्व से तय होती है, तो यकीन मानिए कि आप ऐसे दलदल में पांव रख चुके हैं, जो बेहद खतरनाक है। हालांकि, यह संभव है कि जीन आधारित यह विचारधारा नस्लवाद को न बढ़ाए, पर यह आपको जबरन नसबंदी का समर्थन करने, नोबेल पुरस्कार विजेताओं का शुक्राणु बैंक बनाने, सत्रह बच्चे पैदा करने जैसे कदम उठाने की तरफ भी धकेल सकती है। इस प्रकार, जीन को ही जीवन का मुख्य आधार मान लेना, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक, दोनों ही लिहाज से खतरनाक हो सकता है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Nov 30, 2025, 04:59 IST
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