Nepal: नेपाल की राजनीति में नया अध्याय, युवा लहर से बदली सियासत
नेपाल एक बार फिर अपने लोकतांत्रिक इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। विगत पांच मार्च को हुए आम चुनावों ने देश की राजनीति में एक बड़े परिवर्तन का संकेत दिया है। इन चुनावों में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) की भारी जीत और इसके नेता बालेंद्र (बालेन) शाह का संभावित प्रधानमंत्री के रूप में उभरना सिर्फ एक चुनावी सफलता नहीं, बल्कि नेपाली राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव का प्रतीक माना जा रहा है। ये चुनाव उस पृष्ठभूमि में हुए, जब 2025 में हुए जनरेशन-जेड (जेन-जी) के विरोध प्रदर्शनों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को सत्ता छोड़ने पर मजबूर कर दिया था और देश में पारंपरिक राजनीतिक नेतृत्व के प्रति गहरे असंतोष की भावना सामने आई थी। पिछले दो दशकों से नेपाल लगातार राजनीतिक अस्थिरता का सामना कर रहा है। पिछले अठारह वर्षों में देश में लगभग चौदह सरकारें बदल चुकी हैं। गठबंधन की राजनीति, दलों के बीच वैचारिक मतभेद और नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा ने शासन व्यवस्था को कमजोर किया है। 2026 का चुनाव पुराने दलों के प्रदर्शन पर एक तरह से जनमत संग्रह भी था, जिन्होंने वर्षों तक नेपाल की राजनीति पर प्रभुत्व बनाए रखा। जेन-जी आंदोलन ने देश की राजनीति को झकझोर दिया था। शुरुआत में ये विरोध प्रदर्शन सोशल मीडिया पर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध के खिलाफ हुए थे, लेकिन जल्द ही यह भ्रष्टाचार, कुशासन और राजनीतिक संरक्षणवाद के खिलाफ व्यापक जनआंदोलन में बदल गया। बड़ी संख्या में युवा सड़कों पर उतर आए और उन्होंने व्यवस्था परिवर्तन की मांग की। अंततः प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के इस्तीफा देने के बाद राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने और नए चुनाव कराने की जिम्मेदारी पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार को सौंपी गई। इस बार लगभग 1.89 करोड़ मतदाता 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा के लिए मतदान करने योग्य थे। चुनाव में लगभग 60 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। इन चुनावों में कुछ वर्ष पहले स्थापित आरएसपी ने अप्रत्याशित रूप से बड़ी सफलता हासिल की है। इस परिवर्तन के केंद्र में पैंतीस वर्षीय बालेन शाह हैं, जो नेपाली राजनीति में नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक समय वह रैपर और सोशल मीडिया से जुड़े व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते थे। उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान तब मिली, जब उन्होंने 2022 में स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में काठमांड़ो के मेयर का चुनाव जीता। तब भी उनकी जीत को पारंपरिक राजनीति के खिलाफ जनता की नाराजगी का संकेत माना गया था। इस बार चुनाव में उन्होंने झापा-5 संसदीय क्षेत्र में पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को भारी अंतर से हराया। उनके चुनाव अभियान का मुख्य केंद्र भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कार्रवाई, प्रशासनिक पारदर्शिता और राजनीतिक नेतृत्व में पीढ़ीगत परिवर्तन का वादा रहा। आरएसपी का उभार मुख्य रूप से नेपाल के युवाओं की आकांक्षाओं से जुड़ा हुआ है। जेन-जी आंदोलन ने ऐसा राजनीतिक माहौल बनाया, जिसमें नई राजनीतिक शक्तियों को उभरने का अवसर मिला। बड़ी संख्या में युवा मतदाताओं ने चुनाव परिणामों को निर्णायक रूप से प्रभावित किया। आरएसपी ने सोशल मीडिया, डिजिटल प्रचार और जमीनी संपर्क के जरिये युवाओं तक प्रभावी ढंग से पहुंच बनाई। काठमांड़ो घाटी जैसे शहरी क्षेत्रों और युवा वर्ग में आरएसपी को मजबूत समर्थन मिला। साफ है कि तेजी से बदलते शहरी समाज की अपेक्षाएं पारंपरिक राजनीतिक संरचनाओं से अलग हो चुकी हैं। कई शहरी मतदाताओं को लगता है कि पुराने दल भ्रष्टाचार, अक्षमता और वंशवादी राजनीति के प्रतीक बन गए हैं, जबकि नई पीढ़ी का नेतृत्व पारदर्शिता और जवाबदेही का संदेश देता है। इन चुनावों ने पारंपरिक दलों की कमजोरी को भी उजागर किया है। कई वरिष्ठ नेताओं को हार का सामना करना पड़ा है। हालांकि नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) अब भी देश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे, लेकिन उनकी घटती लोकप्रियता इस बात का संकेत है कि उन्हें अपने संगठन और नेतृत्व में सुधार करना होगा। भारत विशेष रूप से नेपाल के राजनीतिक घटनाक्रमों पर ध्यान दे रहा है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल की जनता को शांतिपूर्ण और सफल चुनावों के लिए बधाई दी और आशा व्यक्त की कि नई सरकार दोनों देशों के बीच सहयोग को और मजबूत करेगी। भारत और नेपाल के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध बेहद गहरे हैं, इसलिए काठमांड़ो में स्थिर सरकार का गठन क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भी अहम माना जाता है। भारत और चीन के बीच स्थित नेपाल को हमेशा संतुलित विदेश नीति अपनानी पड़ती है। नए नेतृत्व के सामने यह चुनौती होगी कि वह दोनों प्रमुख पड़ोसियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे। घरेलू स्तर पर भी नई सरकार से अपेक्षाएं बहुत अधिक हैं। युवा भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और कमजोर प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ हैं। इसलिए सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं, बल्कि व्यापक संस्थागत सुधार जरूरी है। नई सरकार को यह साबित करना होगा कि उसके वादे केवल चुनावी नारे नहीं, बल्कि व्यावहारिक नीतियों में बदल सकते हैं। आर्थिक क्षेत्र में भी नेपाल को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सीमित औद्योगिक विकास, विदेशों में काम करने वाले नेपाली श्रमिकों से आने वाली रेमिटेंस पर अत्यधिक निर्भरता और युवाओं के लिए रोजगार के सीमित अवसर जैसी समस्याएं लंबे समय से बनी हुई हैं। यदि नई सरकार इन मुद्दों पर ठोस कदम नहीं उठाती, तो जनता की उम्मीदें जल्द ही निराशा में बदल सकती हैं। राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना भी एक बड़ी चुनौती होगी। नेपाल में गठबंधन सरकारों और बार-बार सत्ता परिवर्तन का इतिहास रहा है। भले ही आरएसपी को मजबूत जनसमर्थन मिला हो, लेकिन शासन की जटिलताओं को संभालना एक बड़ी परीक्षा होगी। अब उसे एक परिपक्व शासक दल के रूप में स्वयं को साबित करना होगा। फिर भी 2026 के चुनावों ने नेपाल के लोकतांत्रिक विकास में एक नया अध्याय खोल दिया है। अब देखना होगा कि यह राजनीतिक परिवर्तन किस दिशा में जाता है। नेपाल की जनता चाहती है कि यह परिवर्तन बेहतर शासन, मजबूत संस्थाओं और अधिक समावेशी राजनीतिक भविष्य के रूप में सामने आए।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Mar 09, 2026, 05:35 IST
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