मीम, व्यंग्य और बॉडी लैंग्वेज: जंतर-मंतर पर जेन जी ने लिखी विरोध की नई स्क्रिप्ट, 'तीन बंदरों' की नई व्याख्या
जंतर-मंतर पर चल रहा छात्रों का प्रदर्शन केवल नारों का आंदोलन नहीं है, बल्कि विरोध की बदलती भाषा का एक नया चेहरा भी है। यहां हाथों में तख्तियां हैं, लेकिन उन पर लंबे भाषण नहीं, बल्कि मीम, व्यंग्य, छोटे-छोटे पंचलाइन और इंटरनेट संस्कृति से निकले संदेश लिखे हैं। यही वजह है कि यह प्रदर्शन पारंपरिक आंदोलनों से बिल्कुल अलग नजर आ रहा है। प्रदर्शन में शामिल युवाओं का कहना है कि उनकी पीढ़ी सोशल मीडिया के दौर में बड़ी हुई है। इसलिए उनकी अभिव्यक्ति भी उसी शैली में होती है। उनका मानना है कि हास्य, व्यंग्य और रचनात्मकता के जरिए गंभीर मुद्दों को अधिक प्रभावी ढंग से लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। हालांकि, प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पुलिस और प्रशासन अभी भी इस नई भाषा को पुराने नजरिये से समझने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे उनके संदेश का मूल भाव छूट जाता है। जंतर-मंतर पर पोस्टर, इशारे, बॉडी लैंग्वेज और प्रतीकात्मक प्रस्तुतियां आंदोलन का अहम हिस्सा बन चुके हैं। कई पोस्टर सीधे विरोध करने के बजाय संकेतों और कटाक्ष के जरिए सवाल उठाते हैं। यही शैली राहगीरों और सोशल मीडिया, दोनों जगह लोगों का ध्यान खींच रही है। पुरानी नारेबाजी नहीं, ''क्रिएटिव प्रोटेस्ट'' का दौर नई पीढ़ी केवल नारे लगाने तक सीमित नहीं रहना चाहती। प्रदर्शन देखने पहुंचे लोगों का कहना है कि यह आंदोलन डिजिटल संस्कृति और सड़क के विरोध का अनोखा मेल है। यहां पोस्टर किसी मीम की तरह तैयार किए गए हैं और संदेश कुछ शब्दों में गहरी बात कहने की कोशिश करते हैं। युवाओं का मानना है कि आज के दौर में रचनात्मकता ही सबसे असरदार विरोध है। सैनिटरी पैड पर लिखा संदेश बना सबसे बड़ा ''पंच'' प्रदर्शन के दौरान सबसे अधिक चर्चा सैनिटरी नैपकिन पर लिखे संदेशों की रही। एक छात्र के हाथ में सैनिटरी पैड पर लिखा-यह पैड भी लीक नहीं होता, ने सबका ध्यान खींचा। इसे पेपर लीक पर तीखे व्यंग्य के रूप में देखा गया। वहीं महात्मा गांधी के तीन बंदरों की नई व्याख्या भी आकर्षण का केंद्र रही। आंखों पर पट्टी, मुंह पर ताला और कानों में तेल दिखाकर छात्रों ने संदेश दिया-''चोट पर पट्टी लगाओ, आंखों पर नहीं, ताला दरवाजे पर लगाओ, मुंह पर नहीं; तेल बालों में डालो, कानों में नहीं।" एक प्रस्तुति में महात्मा गांधी की आंखों से बहते रक्त जैसे आंसुओं के जरिए भी प्रतीकात्मक विरोध दर्ज कराया गया। बॉलीवुड, एनीमे और मीम्स भी बने आंदोलन के हथियार प्रदर्शन में पॉप-कल्चर की झलक भी खूब दिखाई दी। फिल्म ''गोलमाल 3'' के चर्चित संवाद को बदलकर लिखा गया-"जल्दी इस्तीफा दो, सुबह पनवेल जाना है।" वहीं ''तू झूठी मैं मक्कार'' के शीर्षक का इस्तेमाल राजनीतिक व्यंग्य के लिए किया गया। एक पोस्टर में भारत के नक्शे को चाय में डुबोए जा रहे बिस्किट की तरह दिखाया गया। इसे बनाने वाले छात्र हार्दिक के मुताबिक, यह देश की मौजूदा स्थिति पर उनकी कलात्मक प्रतिक्रिया थी। दूसरी ओर, ''वन पीस'' एनीमे (जापान में एनिमेशन को एनीमे कहा जाता है) के स्ट्रॉहैट पाइरेट स्कार्फ के साथ पहुंचीं शिवांगी ने इसे खतरे की चेतावनी का प्रतीक बताया। सड़क से सोशल मीडिया तक वायरल हुआ विरोध हास्य भी इस आंदोलन का मजबूत हिस्सा बना हुआ है। एक पोस्टर पर लिखा था-"हालात इतने बुरे हैं कि इंट्रोवर्ट भी यहां आ गए हैं।" दूसरे पोस्टर में आंदोलन के समर्थन में कॉकरोच का कार्टून बनाया गया। संसद मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई भाग-दौड़ के वीडियो को ''सबवे सर्फर्स'' गेम की शैली में एडिट कर सोशल मीडिया पर साझा किया गया, जिसने आंदोलन को डिजिटल दुनिया में भी अलग पहचान दिलाई।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Jul 25, 2026, 02:20 IST
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