क्लीनिक और अस्पतालों को बड़ी राहत: छोटी चूक पर अब नहीं जाना पड़ेगा जेल, भरना होगा दंड

अस्पतालों और क्लीनिक को राहत देते हुए केंद्र सरकार ने एक बड़ा नियामकीय सुधार किया है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने क्लीनिकल एस्टैब्लिशमेंट (पंजीकरण एवं विनियमन) अधिनियम, 2010 में संशोधन कर छोटी प्रक्रियागत चूकों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है। अब ऐसे मामलों में जेल की सजा नहीं होगी, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर दंड लगाया जाएगा। 22 जून को घोषित यह बदलाव जन विश्वास (संशोधन प्रावधान) अधिनियम, 2026 के तहत किया गया है। इसका मकसद छोटी-मोटी प्रक्रियात्मक कमियों को अपराध की श्रेणी से हटाना और भरोसे पर आधारित गवर्नेंस को बढ़ावा देना है। हालांकि, सरकार के इस बदलाव पर कुछ सवाल भी उठने लगे हैं। संशोधन में यह स्पष्ट नहीं किया है कि कौन-कौन-सी कमियां मामूली चूक मानी जाएंगीं। मरीज की सुरक्षा से जुड़े नियमों में ढील नहींस्वास्थ्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि यह सुधार केवल छोटी प्रक्रियागत चूक के लिए है। मरीजों की सुरक्षा, उपचार की गुणवत्ता और जवाबदेही से जुड़े नियम पहले की तरह लागू रहेंगे। सरकार का कहना है कि संशोधनों का उद्देश्य दंडात्मक व्यवस्था को संतुलित बनाना है न कि निगरानी व्यवस्था को कमजोर करना। अस्पतालों को ऐसे मिलेगा फायदा मंत्रालय के अनुसार, कई बार अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों को रिकॉर्ड, दस्तावेज या अन्य प्रक्रियागत कमियों के कारण कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ता था, जबकि इनका मरीजों की सुरक्षा या उपचार की गुणवत्ता से सीधा संबंध नहीं होता था। नए नियमों के बाद अनावश्यक मुकदमेबाजी कम होगी। अस्पतालों पर अनुपालन का दबाव घटेगा, नियामकीय प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और सरल बनेगी। इसके अलावा, स्वास्थ्य क्षेत्र में कारोबार करना आसान होगा। सवाल, जिनके नहीं मिले जवाब माइनर डिफिशिएंसी (मामूली चूक) की परिभाषा परिभाषित नहीं है यानी इसमें कौन-कौन सी चूक शामिल होगी मरीज को तत्काल खतरा की व्याख्या कौन करेगा अदालत की जगह कौन अधिकारी फैसला करेगा बार-बार उल्लंघन करने वाले अस्पतालों पर क्या होगा

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jun 26, 2026, 02:56 IST
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