खड्गा कोर बनेगी ड्रोन हब: ऑपरेशन सिंदूर के बाद और घातक हो रही वेस्टर्न कमांड, बढ़ेगी सेना की मारक क्षमता

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना की सबसे महत्वपूर्ण वेस्टर्न कमांड इन दिनों अपनी तकनीकी क्षमताओं को तेजी से बढ़ाने में जुटी है। अत्याधुनिक स्वदेशी उपकरणों को अपनी ताकत बनाने की दिशा में काम कर रही यह कमांड अब तकनीकी क्रांति के सहारे और अधिक घातक बनने की तैयारी कर रही है। ऑपरेशन सिंदूर में अहम भूमिका निभाने वाली वेस्टर्न कमांड अपनी स्ट्राइक खड्गा कोर के अंतर्गत कई यूनिटों को और अधिक प्रभावी बनाने पर काम कर रही है। यह कोर दुश्मन के इलाके में घुसकर टारगेट को नेस्तानाबूद करने और सामरिक क्षेत्रों पर कब्जा करने में माहिर मानी जाती है। साल 1971 के भारत-पाक युद्ध में निर्णायक जीत दिलाने और करीब 90 हजार पाकिस्तानी सैनिकों को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करने में खड्गा कोर की बड़ी भूमिका रही थी। वहीं 1965 के युद्ध में भी लाहौर तक पहुंचकर इस कमांड के जवानों ने अदम्य साहस का परिचय दिया था। पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर में भी इसी कमांड को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। सैन्य सूत्रों के अनुसार दुश्मन के हमलों को विफल करने और पाकिस्तान के रणनीतिक सैन्य अड्डों तक प्रभावी जवाबी कार्रवाई कर इस कमांड ने अपनी ताकत का एहसास दुश्मन को कराया था। स्टार्टअप एजेंसियों से टाइअप ऑपरेशन सिंदूर के बाद अब यह कमांड अपनी तकनीकी ताकत को नई ऊंचाई देने में जुटी है। इस दिशा में सबसे बड़ा कदम खड्गा कोर को ड्रोन हब के रूप में विकसित करना माना जा रहा है। स्ट्राइक कोर ने इसके लिए विशेष ड्रोन ट्रेनिंग सेंटर भी स्थापित किया है। ड्रोन तकनीक से जुड़े कई स्टार्टअप्स के साथ भी टाइअप किए जा रहे हैं। चेन्नई स्थित एक स्टार्टअप की मदद से भारतीय सेना ने अत्याधुनिक अनमैन्ड एरियल व्हीकल (यूएवी) विकसित किया है। यह यूएवी दुश्मन के इलाके में 100 किलोमीटर तक सटीक हमला करने में सक्षम बताया जा रहा है। खड्गा कोर की डीप स्ट्राइकर्स ईगल यूनिट और स्टार्टअप ने संयुक्त रूप से इस स्वदेशी मानवरहित एरियल व्हीकल को तैयार किया है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह इलेक्ट्रॉनिक वाॅरफेयर प्रूफ है यानी दुश्मन की जैमिंग और इलेक्ट्रॉनिक हमलों का इस पर सीमित असर होगा। जवान तैयार कर रहे ड्रोन, बारूद वेस्टर्न कमांड की इंजीनियरिंग रेजिमेंट के जवान अब खुद भी अत्याधुनिक ड्रोन और गोला-बारूद तैयार कर रहे हैं। सैन्य सूत्रों के अनुसार पिछले एक वर्ष में हजारों स्वदेशी ड्रोन तैयार किए जा चुके हैं। इन ड्रोनों में इस्तेमाल होने वाला गोला-बारूद भी सेना की तकनीकी यूनिटें ही विकसित कर रही हैं। रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल चंद्र प्रकाश (सेवानिवृत्त) के अनुसार मॉर्डन वाॅरफेयर तेजी से बदल रहा है। अब युद्ध केवल टैंक और मिसाइलों तक सीमित नहीं रह गया बल्कि ड्रोन, सेंसर, एआई, मशीन लर्निंग और हाइपरसोनिक तकनीक इसकी दिशा तय कर रही हैं। उनका कहना है कि यदि दुश्मन ने दोबारा गलती की तो भारतीय सेना का जवाब पहले से कहीं अधिक घातक और अप्रत्याशित होगा। हाल ही में वेस्टर्न कमांड ने सीमा के नजदीक स्थित मामून छावनी में अपने अत्याधुनिक हथियारों और तकनीकों का प्रदर्शन भी किया। सेना आने वाले समय में विभिन्न फायरिंग रेंज में बड़े युद्धाभ्यास करने की तैयारी में है ताकि जवानों को नई तकनीकों के अनुरूप प्रशिक्षित किया जा सके।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: May 10, 2026, 07:44 IST
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