Kerala: डिजिटल साक्षरता ने केरल में बदला प्रचार का व्याकरण, चुनाव को लेकर सक्रियता में कमी नहीं; शोर कम

केरल की राजधानी की सड़कों पर उतरते ही जैसा सन्नाटा पसरा था, वह दिल्ली या उत्तर भारत के चुनावी शोर के आदी किसी व्यक्ति को असामान्य लग सकता है। यहां न तो धूल उड़ाते काफिले हैं, न ही भीड़भाड़ वाले रोड शो और जुलूस। हालांकि यह शांति उदासीनता नहीं, बल्कि बेहद व्यवस्थित डिजिटल साक्षरता का परिणाम है। केरल में राजनीति अब सड़कों से हटकर स्मार्टफोन के डाटा और मतदाताओं के सीधे संवाद में तब्दील हो गई है। 90 फीसदी से ज्यादा इंटरनेट पैठ वाले इस राज्य में प्रचार अब व्हाट्सएप समूहों, फेसबुक लाइव और इंस्टाग्राम की रील्स पर शिफ्ट हो चुका है। हाई-टेक वॉर रूम जैसे दिख रहे पार्टियों के दफ्तर राजधानी में पार्टियों के दफ्तर भी किसी कंट्रोल सेंटर जैसे दिखते हैं। यहां डाटा एनालिटिक्स के जरिये तय किया जा रहा है कि किस वोटर समूह को किस प्रकार का संदेश भेजना है। व्यक्तिगत संपर्क के लिए प्रत्याशी सीधे वीडियो कॉल या पर्सनलाइज्ड मैसेज का सहारा ले रहे हैं। पार्टियों ने हर बूथ के लिए समर्पित डिजिटल वॉरियर तैनात किए हैं। एक चुनावी कार्यकर्ता ने बताया कि यहां का मतदाता शिक्षित और जागरूक है। वह नारों से ज्यादा उम्मीदवार के रिकॉर्ड और पार्टी के घोषणापत्र को तवज्जो देता है, जिन्हें डिजिटल माध्यमों से पढ़ना आसान है। मतदाता पारंपरिक शोर-शराबे वाले प्रचार से कम प्रभावित होते हैं। ग्रीन प्रोटोकॉल: सूती कपड़ों के बैनर से ही कर सकते प्रचार सड़कों पर चुनावी गहमागहमी की कमी के पीछे बड़ा कारण चुनाव आयोग के नियमों का कड़ाई से पालन और राज्य की ग्रीन प्रोटोकॉल नीति भी है। पीवीसी और प्लास्टिक के विज्ञापनों पर प्रतिबंध है। राजनीतिक दल केवल सूती कपड़ों के बैनर या पोस्टरों का उपयोग कर सकते हैं। सियासी पार्टियां भी यह स्थिति समझते हुए अपने संसाधन डिजिटल रणनीति की ओर मोड़ रहे हैं। केरल के वरिष्ठ पत्रकार एमजी राधाकृष्णन ने बताया कि डिजिटल साक्षरता लगभग शत प्रतिशत है, इसलिए सोशल मीडिया के माध्यम से प्रचार का चलन अधिक देखा जा रहा है। केरल की गिनती धनाढ्य राज्यों में होती है, लोग लंबे व थका देने वाले चुनावी अभियान में शामिल नहीं होते। कुटुंबयोगम घर पहुंचकर समझाते हैं पार्टियों की विचारधारा : राज्य की राजनीति सड़कों से निकल कुटुंबयोगम को अपना रही है। इसकी जड़ें सामाजिक व्यवस्था से जुड़ी हैं, जिसमें परिवार के सदस्य एकसाथ बैठकर पारिवारिक मुद्दों पर चर्चा करते थे। यह सामाजिक एकजुटता का एक तरीका था। कालांतर में वामपंथी आंदोलनों ने इस सामाजिक ढांचे को राजनीति से जोड़ा और आज यह सभी पार्टियों के प्रचार का धारधार हथियार है। अन्य वीडियो

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Apr 01, 2026, 06:46 IST
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