कमलेश राजहंस: मुझे गुजरा हुआ बचपन सुहाना याद आता है
मुझे गुजरा हुआ बचपन सुहाना याद आता है वो रोना रूठना फिर मान जाना याद आता है बनाकर नाव कागज की बिठा कर उस पे चींटों को नदी तालाब नालों में बहाना याद आता है किरासन तेल लकड़ी पर गिरा मां का रसोई में बड़ी हिकमत से चूल्हे का जलाना याद आता है निमंत्रण में जो आते थे बिठा कर एक पंगत में चटाई और जाजिम पर खिलाना याद आता है बड़ों को देख कर शरमा के अपने चांद से मुख को मुझे दुल्हन का घूंघट में छुपाना याद आता है उठा करती थी जब गौने की डोली या कोई अर्थी सभी लोगों का अश्कों में नहाना याद आता है कलम दावात पट्टी बाल पोथी ले के झोले में मुझे स्कूल नंगे पांव जाना याद आता है रुंआसा हो के बाबू जी की उंगली थाम मेले से खिलौने के बिना घर लौट आना याद आता है जहां मंगल कलश पर दीप जलते थे दुआओं के मुझे वो गांव का बरगद पुराना याद आता है हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Jul 25, 2026, 19:02 IST
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