जंक फूड की स्टार रेटिंग क्यों नहीं होती: स्वस्थ भोजन सबका अधिकार

हम सब लोगों की आदत में अब एक चीज शामिल हो चुकी है। कोई भी बिजली का उपकरण खरीदते वक्त दुकानदार हमेशा उसकी पांच सितारा रेटिंग बताता है कि वह उपकरण कितनी बिजली इस्तेमाल करेगा। हम ऐसे उपकरण खरीदने में रुचि दिखाते हैं, ताकि बिजली का बिल कम आए। लेकिन यही सोच हम अपने शरीर और खाने-पीने पर क्यों नहीं अपनाते सोचिए, अगली बार जब आप दुकान पर जाएं, या ब्लिंकिट अथवा जेप्टो से ऑनलाइन कुछ चिप्स, कोल्ड ड्रिंक आदि मंगवाएं, और उन्हें खरीदने से पहले उनकी पांच सितारा रेटिंग देखें! तो, क्या यह अद्भुत बात नहीं होगी! बेशक यह सिगरेट की वैधानिक चेतावनी जैसा तो नहीं है, लेकिन यह आपको कुछ पैमानों पर एक मानक प्रस्तुत करेगा कि उत्पाद शरीर के लिए कितना सही है और कितना नहीं। कहीं इसमें चीनी या नमक की मात्रा बहुत ज्यादा तो नहीं और क्या उत्पाद में मैदा या अल्ट्रा प्रोसेस्ड केमिकल्स का इस्तेमाल किया गया है या नहीं असल में, एक ऐसा ही प्रस्ताव भारत सरकार की एक एजेंसी लाना चाह रही है। लेकिन बड़ी-बड़ी कंपनियां नहीं चाहतीं कि उनकी असलियत आप तक पहुंचे। भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई), जो खाने-पीने के उत्पादों को सर्टिफिकेट देती है, एक प्रस्ताव लेकर आया है कि हर जंक फूड के आगे एक पांच सितारा लेबल लगे। इसको फ्रंट ऑफ पैक न्यूट्रीशन लेबलिंग (एफओपीएनएल) कहा गया है। अब तक खाने-पीने का सामान पौष्टिक है या नहीं, वह हमेशा एक सारणी के माध्यम से पैकेट के पीछे छपा रहता है, जिसे कोई पढ़ता भी नहीं। इसी के चलते हेल्थ स्टार रेटिंग का यह एक नया फॉर्मूला लाया गया है। एफओपीएनएल एक चेतावनी लेबल होगा। यदि उत्पाद में नमक या चीनी की मात्रा तय मानक से अधिक है, तो यह लेबल लाल रंग का होगा। इसके अलावा, एक न्यूट्री-स्कोर भी प्रस्तावित है। मसलन, गहरे हरे-सबसे स्वस्थ, हरे-स्वस्थ, पीले-मध्यम, नारंगी-मध्यम से थोड़ा ज्यादा हानिकारक, गहरे नारंगी-अत्यधिक हानिकारक एवं सुर्ख लाल- बेहद खतरनाक। इसके अलावा, हेल्थ स्टार रेटिंग (एचएसआर) एक और प्रावधान है। यहां 0.5 से फाइव स्टार तक दिए जाएंगे। यानी, जितने ज्यादा स्टार होंगे, उतना स्वस्थ वह उत्पाद होगा। यह सब इसलिए जरूरी हो जाता है, क्योंकि भारत हर तरह के रोग की राजधानी बनता जा रहा है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मधुमेह की समस्या वाला देश है। एक अनुमान के हिसाब से 11.4 फीसदी भारतीय मधुमेह से पीड़ित हैं, जो वैश्विक स्तर से ज्यादा है। इसके अलावा, मोटापा भी एक भयावह समस्या है। महिलाओं में यह समस्या 2005-06 में 12.6 फीसदी से बढ़कर 2019-21 में 24 फीसदी हो गई, जबकि पुरुषों में 9.3 फीसदी से बढ़कर 22.9 फीसदी। भारत में 2.7 करोड़ से अधिक बच्चे और किशोर मोटापे की समस्या से ग्रस्त हैं। दरअसल, इन सब के पीछे पैकेट बंद खाना और अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। पैकेट बंद खाना जल्दी से भूख तो मिटा देता है, लेकिन उसके दुष्परिणाम हमारी सेहत पर भी दिखाई देते हैं। मोटापा कम करने की दवाई भी हिंदुस्तान में अब धड़ल्ले से बिक रही है। ओजेंपिक और मोंजारो के इंजेक्शन इसके कुछ उदाहरण हैं। यानी हम मूल समस्या से भी जूझ रहे हैं और उसके इलाज व दवाई का बोझ भी झेल रहे हैं। यह अच्छी आदत नहीं है। ऐसे में, रेटिंग और लेबल लगाना अच्छा कदम है। लेकिन उद्योग जगत इस कदम के खिलाफ है। उसका मानना है कि यह रेटिंग सिस्टम हिंदुस्तान के लिए नहीं बना है। उद्योग जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण द्वारा प्रस्तावित लेबलिंग प्रणाली फ्रांस, बेल्जियम, ऑस्ट्रेलिया, चिली, इस्राइल, मेक्सिको और पेरू जैसे देशों के मॉडल से प्रेरित है, जो भारत की विविध आहार आदतों और वास्तविकताओं को ध्यान में नहीं रखती। उनका यह भी कहना है कि पश्चिमी देशों में लोग ज्यादा प्रोसेस्ड (तैयार पैकेट वाले) फूड खाते हैं। वहीं भारत में ऐसा कम होता है। यहां कुल कैलोरी का 12 फीसदी से भी कम हिस्सा ही प्रोसेस्ड और रेडी-टू-ईट फूड से आता है। बाकी लगभग 88 प्रतिशत खाना घर पर बना हुआ या पारंपरिक तरीके से बाहर का होता है। तर्क यह दिया जा रहा है कि तमाम हिंदुस्तानी आदतें, जैसे अचार, मिठाई व मक्खन कम मात्रा में खाया जाता है। अगर विदेशी नियम लगाए गए, तो इसके दुष्प्रभाव बढ़ा-चढ़ाकर बताए जाएंगे, जबकि वास्तविक सेवन कम होगा। पर यह तर्क कोई भी डॉक्टर मानने को तैयार नहीं। सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और पोषण वैज्ञानिक कहते हैं कि एफओपीएनएल उपभोक्ताओं की मदद करेंगे। कई लोग पैकेट पर विस्तृत पोषण जानकारी पढ़ने में समय नहीं लगाते। ऐसे में, सरल चेतावनी लेबल तुरंत उन्हें सूचित कर सकते हैं। वे मानते हैं कि हमारी खान-पान की परंपराएं अलग होती हैं, लेकिन उनका कहना है कि ज्यादा चीनी नुकसान करती है। अगर लोग सिर्फ एक चम्मच चीनी भी कम कर दें, तो इससे बड़ा बदलाव आ सकता है। लेकिन खाना जैसा भी हो, यदि वह हानिकारक है, तो चेतावनी क्यों न दी जाए सुप्रीम कोर्ट सहित कई संस्थाएं इस मुद्दे पर सक्रिय रूप से चर्चा कर रही हैं। कोर्ट यह तक कह चुका है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य उद्योग के हितों से ऊपर है। एफएसएसएआई को बिना देरी के स्पष्ट, प्रभावी एफओपीएनएल फ्रेमवर्क बनाना चाहिए। अगर जरूरी हुआ, तो कोर्ट खुद हस्तक्षेप कर सकता है। फिर भी एफएसएसएआई 2022 से अब तक आगे नहीं बढ़ पाया। ऐसे में, देश को और आप को तय करना है कि आप किसका साथ देना चाहेंगे। जंक फूड वाली कंपनी का या अपनी सेहत का, क्योंकि सेहत तभी फाइव स्टार होगी, जब आपका खाना पांच सितारा होगा। स्वस्थ भोजन सबका अधिकार होना चाहिए और खाद्य पदार्थों की सुरक्षा उपभोक्ताओं की सुरक्षा तो है ही, यह देश के सामाजिक-आर्थिक हितों के लिए भी बेहद फायदेमंद है।     

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Apr 18, 2026, 07:27 IST
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