बंदूकों के मालिक: कैसे आईआरजीसी ने ईरान और पश्चिम एशिया की राजनीति बदल दी
कोई भूमिका नहींसब कुछ तो सामने है। बस याद रखिए एक नाम, इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर, यानी आईआरजीसी। एक ऐसा संगठन, जिसने आधी सदी में ईरान की राजनीति, पश्चिम एशिया की रणनीति और कई युद्धों का नक्शा बदल दिया। टाइम मशीन में सीट पकड़िए। गंतव्य पथ पर डायल सेट हो चुका है और हम तेहरान जा रहे हैं। डायल पर देखिए-फरवरी 1979। हम नीचे उतर रहे हैं। हवा में क्रांति की गंध है। बारूद की हल्की महक भी महसूस कीजिए। और महसूस कीजिए एक बेचैनी, जैसे दुनिया नए सिरे से बन रही हो। हर तरफ लोग हैं। हाथों में अलग-अलग तरह की बंदूकें, पर आंखों में एक ही आग-न पूर्व, न पश्चिम-सिर्फ इस्लामिक रिपब्लिक। शाह जा चुके हैं। दो-ढाई हजार साल पुरानी फारसी राजशाही कुछ ही दिनों में ढह गई है। सदियों से सत्ता का प्रतीक मोर सिंहासन अब इतिहास के मलबे में पड़ा है। उधर चलते हैं, जहां भीड़ लगी है। यहां तेहरान के एक साधारण-से दफ्तर में मौलवियों और सैन्य कमांडरों की बैठक चल रही है। बहस सिर्फ एक सवाल पर है। अब बंदूकों पर नियंत्रण किसका होगा इस सवाल का जवाब अगले पचास साल तक गूंजने वाला है। सत्ता के केंद्र में हैं आयतुल्ला रुहोल्ला खुमैनी। टाइम मशीन मई, 1979 की तरफ बढ़ रही है। खुमैनी के आदेश से जन्म ले रहा है एक नया संगठन। इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर या सेपाह-ए-पासदारान। यह पारंपरिक सेना नहीं है। ईरान की नियमित सेना, जिसे आर्तेश कहा जाता है, दशकों तक पहलवी राजशाही की सेवा करती रही थी। उसके अधिकारी अमेरिका और पश्चिमी देशों में प्रशिक्षित थे, और उसकी निष्ठा शाह के प्रति थी, न कि मौलवियों के प्रति। खुमैनी को 1953 की वह घटना भली-भांति याद है, जब सीआईए समर्थित तख्तापलट ने लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेक की सरकार गिरा दी थी और शाह को दोबारा सत्ता में बिठा दिया था। खुमैनी ऐसा दोबारा नहीं होने देंगे। सत्ता के लिए कई ताकतें मैदान में हैं-वामपंथी, राष्ट्रवादी, इस्लामी गुट और कुर्द अलगाववादी। खुमैनी को पता है कि क्रांति को बचाने के लिए अपनी अलग सैन्य ताकत जरूरी है। इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर-पासदारान यानी खुदा के सिपाही आ गए हैं। यह फौज सीधे खुमैनी के प्रति जवाबदेह है। युवा, धार्मिक जोश से भरे लड़ाके, जो अलग-अलग हथियारबंद संगठनों से आए हैं, एक नए सैन्य ढांचे में ढाले जा रहे हैं। अब ईरान में दो सेनाएं हैं-एक आर्तेश, जो ईरान की सीमाओं और क्षेत्रीय संप्रभुता की हिफाजत करती है और दूसरे हैं-पासदारान, जो इस्लामी क्रांति की रक्षा करते हैं, तख्तापलट रोकते हैं, आंतरिक विरोध को दबाते और इस्लामी नियमों को लागू करते हैं। टाइम मशीन गुर्राते हुए अगले पड़ाव की तरफ बढ़ रही है। 1980। हम दक्षिणी ईरान में खोर्रमशहर और बसरा के बीच कहीं उतर गए हैं। आपको सुनाई दे रही है तोपों की आवाज सितंबर, 1980 में सद्दाम हुसैन की सेना ने ईरान पर हमला कर दिया। उसे उम्मीद थी कि नई-नई क्रांति वाला देश जल्दी टूट जाएगा, पर वह बुरी तरह गलत साबित हुआ। आईआरजीसी के पास आधुनिक हथियार कम हैं-न बराबरी के टैंक, न कोई बड़ी वायुसेना। लेकिन उनके पास एक चीज है-मरने की तैयारी। पासदारान ह्यूमन वेव हमले कर रहे हैं। यह बलिदान पर चलने वाली क्रांति थी। आपको एक युवा फौजी दिखाई दे रहा है, नक्शे पर झुका हुआ उसका नाम है-कासिम सुलेमानी। सिर्फ बाईस साल का। अभी-अभी पासदारान में शामिल हुआ है। वह युद्ध के भूगोल को पढ़ सकता है। आपको अभी नहीं पता है कि वह आगे क्या बनेगा। उसे भी नहीं। पर जब वह नक्शे पर अपनी उंगली फेरता है, तो आपको महसूस होता है कि यह आदमी इतिहास की दिशा बदल सकता है। इस जंग को यहीं छोड़कर टाइम मशीन उड़ रही है बेरूत की तरफ। डायल पर दिख रहा है 1983 का साल। हम लेबनान की बेका घाटी में उतर रहे हैं। आईआरजीसी यहां 1982 से मौजूद है। कागज पर उनका मिशन था-फलस्तीनी लड़ाकों को प्रशिक्षण देना, पर असली योजना कहीं ज्यादा बड़ी थी। यहां तंबाकू और इलायची की खुशबू वाले सुरक्षित घरों में बैठकों का दौर चल रहा है। यहां आईआरजीसी का कुद्स फोर्स एक नए संगठन की नींव रख रहा है-यह हिज्बुल्लाह है। ईरान पैसा देगा, हथियार देगा, प्रशिक्षण देगा और बदले में हिज्बुल्लाह ईरान को देगा-भूमध्यसागर तक रणनीतिक पहुंच। 23 अक्तूबर, 1983 को एक ट्रक बम बेरूत में अमेरिकी मरीन बैरकों को उड़ा देता है। 241 अमेरिकी सैनिक मारे जाते हैं। पासदारान के मॉडल का परीक्षण सफल रहा है। 1988, अब हम ईरान में हैं। आठ साल बाद इराक से जंग खत्म हो रही है। आईआरजीसी कमजोर नहीं हुआ, वह युद्ध से तपकर निकला है। अब उसके पास है, अपनी खुफिया एजेंसी, अपनी नौसेना, मिसाइल कार्यक्रम, और पूरे क्षेत्र में मिलिशिया का नेटवर्क। टाइम मशीन अब 2020 में है। जनवरी का महीना है। हम बगदाद अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे के पास हैं। अचानक आसमान चीरती हुई रोशनी दिखाई देती है। दो अमेरिकी एमक्यू-9 रीपर ड्रोन मिसाइल दागते हैं। कुछ ही सेकंड में गाड़ियां जल उठती हैं। मरने वालों में एक नाम है-मेजर जनरल कासिम सुलेमानी। वही युवक, जो कभी नक्शे पर उंगली फेर रहा था। वह दो दशकों से आईआरजीसी की कुद्स फोर्स का कमांडर था। पश्चिम एशिया का शायद सबसे प्रभावशाली सैन्य व्यक्ति। वाशिंगटन उसे दुनिया का सबसे बड़ा आतंक समर्थक कहता था। तेहरान उसे शहीद मानता था-जब वह जीवित था, तब भी। अब उसकी याद में सड़कों पर लाखों लोग उतर आते हैं। टाइम मशीन वापस लौट रही है 2025 में। आईआरजीसी वैसा नहीं है, जैसा उसके संस्थापकों ने कल्पना की थी-फिर भी ठीक वैसा ही है, जैसा वे चाहते थे। यह ईरान की औपचारिक अर्थव्यवस्था के 10 से 15 प्रतिशत हिस्से को नियंत्रित करता है। उसके कुद्स फोर्स के रिश्ते हैं, हिज्बुल्लाह, हमास, यमन के हूती और इराक-सीरिया की कई मिलिशियाओं से। उसने ऐसा बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम बनाया है, जो अमेरिकी ठिकानों और इस्राइली शहरों तक पहुंच सकता है। उसने प्रतिबंधों, हत्याओं और साइबर हमलों को झेला है। आईआरजीसी सिर्फ ताकत की कहानी नहीं है। यह आम लोगों की नैतिकता की निगरानी करता है। पर उसके कई कमांडरों के बच्चे यूरोप में पढ़ते हैं। 2022 में जब महसा अमीनी की मौत के बाद महिलाएं सड़कों पर उतरीं, तो उसी आईआरजीसी से जुड़े बलों ने उस आंदोलन को दबाने में भूमिका निभाई। आज लगभग आधी सदी बाद, आईआरजीसी उस जंग से मुकाबिल है, जिसकी सबसे लंबी तैयारी उसने की थी। वह इस्राइल और अमेरिका से दोहरा मोर्चा ले रहा है। पश्चिम एशिया की यह जंग प्रत्यक्ष और प्रॉक्सी, दोनों रूपों में पासदारान का मुस्तकबिल तय करेगी। टाइम मशीन ईरान नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया में उतर रही है। वक्त को देखिए, क्योंकि दुनिया का भविष्य अब केवल इस बात से तय होगा कि सेपाह-ए-पासदारान यानी क्रांति के ये पहरेदार आगे भी इतिहास लिखेंगे या इतिहास उनके बारे में अंतिम फैसला लिखने वाला है।फिर मिलते हैं अगले सफर पर
- Source: www.amarujala.com
- Published: Mar 15, 2026, 03:50 IST
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