इंदौर: मासूम अनिका के इलाज के लिए जुट गया पैसा, अब शुरू होगा इलाज
इंदौर की अनिका शर्मा के इलाज के लिए आखिरकार क्राउड फंडिंग के जरिए 9 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जुटा ली गई है। अब एम्स में उसका इलाज शुरू हो सकेगा। इंजेक्शन खरीदने के लिए जुटाई गई रकम संबंधित कंपनी को दी जाएगी। हालांकि, इलाज के अन्य खर्चों के लिए सरकार की ओर से भी आर्थिक सहायता मिलनी है। करीब दो महीने पहले तक अनिका के इलाज के लिए 8 करोड़ रुपये जुटाए जा चुके थे। रविवार को इंदौर के ही एक व्यक्ति ने पांच लाख रुपये से अधिक की मदद की, जिसके बाद जरूरी राशि का लक्ष्य पूरा हो गया। शुरुआत में इंजेक्शन की कीमत साढ़े आठ करोड़ रुपये थी, लेकिन डॉलर की कीमत में बढ़ोतरी के कारण अमेरिका से मंगाए जाने वाले इंजेक्शन की लागत बढ़ गई। ऐसे में इसे खरीदने के लिए 9 करोड़ रुपये से अधिक की जरूरत पड़ी। अब अनिका के माता-पिता भी राहत महसूस कर रहे हैं। पिछले एक साल से वे बेटी के इलाज के लिए लगातार प्रयास कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने गरबा आयोजनों सहित कई माध्यमों से लोगों से आर्थिक मदद जुटाई। इंदौर में उन्हें सबसे अधिक सहयोग मिला। अब इलाज के लिए जरूरी रकम जुट जाने के बाद क्राउड फंडिंग बंद कर दी जाएगी। सालभर की मेहनत से जुटी रकम अनिका की बीमारी का पता चलने के बाद उसके माता-पिता सरिता और प्रवीण शर्मा ने इलाज की जानकारी जुटानी शुरू की। मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले माता-पिता के लिए इतनी बड़ी रकम जुटाना आसान नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और लोगों की मदद से क्राउड फंडिंग अभियान चलाया। इसके लिए वे मुंबई भी गए। अनिका के इलाज का मामला इंदौर हाईकोर्ट तक पहुंच चुका है। कोर्ट ने भी सरकार को आर्थिक मदद देने के लिए कहा है। अब इंजेक्शन के लिए जरूरी रकम जुटने के बाद परिवार को उम्मीद है कि अनिका का इलाज जल्द शुरू हो सकेगा। हालांकि, इंजेक्शन की कीमत जुटाना ही माता-पिता के सामने एकमात्र चुनौती नहीं थी। अनिका को यह इंजेक्शन देने के लिए उसका वजन साढ़े 13 किलो से कम होना जरूरी बताया गया है। ऐसे में माता-पिता ने कम कैलोरी वाला आहार देकर उसके वजन को नियंत्रित रखा। फिलहाल अनिका का वजन करीब साढ़े 11 किलो है। क्या है SMA टाइप-2 बीमारी स्पाइनल मस्क्यूलर एट्रॉफी (SMA) टाइप-2 एक आनुवंशिक बीमारी है, जो मांसपेशियों को नियंत्रित करने वाली तंत्रिका कोशिकाओं यानी मोटर न्यूरॉन्स को प्रभावित करती है। इसके लक्षण आमतौर पर 6 से 18 महीने की उम्र के बच्चों में दिखाई देने लगते हैं। इस बीमारी से पीड़ित बच्चे बिना सहारे के बैठ सकते हैं, लेकिन उन्हें अपने दम पर खड़े होने और चलने में कठिनाई होती है। समय पर इलाज और उचित चिकित्सकीय देखभाल से बीमारी के प्रभाव को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Oct 19, 2026, 07:33 IST
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