India on Ukrain: यूक्रेन मुद्दे पर रूस के साथ, भारत के रुख पर लगने लगे कयास

सदियों से रूसी साम्राज्य और बाद में सोवियत संघ ने विश्व राजनीति की परिधि एवं केंद्र के बीच हमेशा खुद को झुलते हुए पाया। फिर से रूस विश्व राजनीति में विवाद का केंद्र बन गया है। रूस-यूक्रेन गतिरोध को लेकर जारी तनाव केबीच भारत के रुख को लेकर कयास लगने शुरू हो गए हैं। लंबे समय तक चुप रहने के बाद नई दिल्ली ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में यूक्रेन मामले में रूस के खिलाफ अमेरिकी प्रस्ताव पर मतदान से खुद को अलग रखा। इसके साथ नईदिल्ली ने शांतिपूर्ण बातचीत के जरिये तनाव को तत्काल कम करने की अपील की। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टी.एस. तिरुमूर्ति ने स्पष्ट किया, 'भारत का हित एक ऐसा समाधान खोजने में है, जो सभी देशों के वैध सुरक्षा हितों को ध्यान में रखते हुए तनाव को तत्काल कम कर सके और इसका उद्देश्य क्षेत्र और उससे बाहर दीर्घकालिक शांति और स्थिरता हासिल करना है।' रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 'वोट से पहले अमेरिकी दबाव के आगे न झुकने' के भारतीय कदम को 'साहसिक' बताया। हालांकि अमेरिकी नेतृत्व वाले पश्चिमी खेमे ने भारत के रुख पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। वर्ष 2014 में भी नई दिल्ली ने इसी तरह रूसी हित का हवाला देकर खुद को वोटिंग से अलग रखा था। तब क्रीमिया मुद्दे पर भी पुतिन ने भारत के 'संयम और निष्पक्षता' की सराहना की थी। मास्को ने भारत के रुख की सराहना करते हुए कहा कि दोनों देश अन्य देशों के 'घरेलू मामलों में हस्तक्षेप न करने' के लिए प्रतिबद्ध हैं। यूक्रेन मामले में रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने की पश्चिमी देशों की धमकियों के बीच भारत ने स्पष्ट कहा है कि 'वह रूस के खिलाफ किसी भी आर्थिक प्रतिबंध का पक्षकार नहीं बन सकता।' भारत का बयान मास्को के साथ करीबी गठबंधन का प्रमाण है। सभी पक्षों के वैध सुरक्षा हितों के उल्लेख का मतलब यह था कि मास्को को अपने निकट पड़ोस में नाटो की उपस्थिति को लेकर गहरी सुरक्षा चिंताएं थीं। इसके अलावा, नई दिल्ली ने पूरे बयान में यूक्रेन की सीमा पर रूसी सैन्य जमावड़े के बारे में उल्लेख नहीं किया। इसे अमेरिका के नेतृत्व वाले नाटो और यूक्रेन को मौजूदा संकट के लिए कारक के रूप में उद्धृत किया गया है। रूस भारत के लिए क्यों मायने रखता है असल में नई दिल्ली मास्को के साथ अपने विश्वसनीय और वर्षों से परखी हुई साझेदारी को खतरे में नहीं डालना चाहता। भारत की सैन्य आपूर्ति का लगभग 60 प्रतिशत रूस निर्मित है। साफ हैकि मास्को को अलग-थलग करने का जोखिम भारत नहीं उठा सकता है, खासकर तब, जब भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच पूर्वी सीमा पर गतिरोध बना हुआ है। नई दिल्ली की रणनीतिक गणना यह संकेत देती है कि वह रूस के आंतरिक मामलों में संलिप्त नहीं होना चाहती। बदले हुए भू-राजनीतिक माहौल में मास्को और नई दिल्ली ने अपनी-अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ाई है। दोनों ने विश्व मंचों पर क्षेत्रीय अखंडता और रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सोवियत संघ के दौरान भारत और रूस, जो कश्मीर को भारत का आंतरिक मामला बताता था, की दोस्ती अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अभूतपूर्व थी। बेशक अब समय बदल गया है। दोनों देश अपने-अपने सामरिक मुद्दों को नई वास्तविकताओं के अनुसार चला रहे हैं। पुरानी कहावत अब भी याद दिलाती है कि कोई स्थायी मित्र नहीं होता, केवल हित स्थायी होते हैं। साझा सुरक्षा चिंताओं ने दोनों देशों को जोड़ा था और भविष्य में भी दोनों को करीब ला सकता है। भारत ने अपनी सेना के लिए एके-203 राइफल बनाने के लिए रूस के साथ 60 करोड़ डॉलर के संयुक्त उद्यम समझौता किया है। इन सौदों के साथ रूस भारत के प्रमुख हथियार आपूर्तिकर्ता के रूप में शीर्ष पर है। दोनों देश एक और दशक के लिए सैन्य प्रौद्योगिकी सहयोग समझौते का विस्तार करना चाहते हैं, जो अमेरिका को संभवतः अच्छा नहीं लगेगा। इस पृष्ठभूमि में नई दिल्ली ने हाल के दिनों में संयुक्त राष्ट्र में कई बार रूस के साथ गठबंधन कर मतदान किया है। नए भू-राजनीतिक रुझानों को समझने के लिए दोनों पक्षों द्वारा अभी व्यावहारिक लचीलेपन का आनंद लिया जा रहा है। पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूस आर्थिक और सैन्य स्तर पर चीन के करीब चला गया है। उसी तरह, क्वाड के माध्यम से भारत की संलग्नता किसी भी तरह से रूस की तरफ नहीं है, बल्कि चीन के मुखर और व्यापक हितों के खिलाफ अपनेराष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए है। नई दिल्ली द्वारा 'शांतिपूर्ण समाधान' का आह्वान चीन-पाकिस्तान-रूस के उभरते त्रिकोण को कमजोर करने के लिए एक और दांव होगा। हिंद-प्रशांत क्षेत्र की बढ़ती प्रमुखता के कारण मास्को और नई दिल्ली के बीच मतभेदों की एक शृंखला उभरी। नई दिल्ली का मानना है कि चीनी खेमे की तुलना में मास्को को अपने खेमे में रखना बेहतर है। रूस ने न केवल क्षेत्रीय, बल्कि वैश्विक मामलों में भी भारत के उदय और महत्व को स्वीकार किया है। रूस की मुख्य सुरक्षा चिंता के यथार्थवादी विचारक जबिग्न्यू ब्रजेजिंस्की यूक्रेन के भू-राजनीतिक दबदबे को निम्नलिखित शब्दों में रेखांकित करते हैं : यूक्रेन के बिना रूस एक साम्राज्य नहीं रह जाता है, जबकि यूक्रेन को मिलाकर वह स्वतः एक साम्राज्य बन जाता है। पूर्व सोवियत संघ के अन्य गणराज्यों के विपरीत यूक्रेन मास्को के लिए महत्वपूर्ण स्थान रखता है। 5.2 करोड़ की आबादी के साथ एक स्वतंत्र यूक्रेन का उदय सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक घटनाओं में से एक था और रूसी राजनीतिक इतिहास में एक राष्ट्रीय त्रासदी माना जाता था। यूक्रेन हमेशा से एक महत्वपूर्ण देश रहा है, और अब भी है : पहला, अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण, और दूसरा, रूसी संघ के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों के कारण। नाटो के पूर्व की ओर विस्तार से रूस के मुख्य रणनीतिक हितों को खतरा है, जो नाटो और रूसी संघ के बीच विवाद का विषय है। रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने बार-बार आरोप लगाया है कि पश्चिम ने हमसे कई बार झूठ बोला है, पीठ पीछे फैसले लिए हैं। यह नाटो के पूर्व में विस्तार के साथ हुआ है। साफ है कि रूस की भू-रणनीतिक अस्थिर स्थिति ने रूसी नीति-निर्माताओं के लिए सुरक्षा चिंता बढ़ा दी है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Feb 08, 2022, 01:45 IST
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