दल-बदल कानून पर उठ रहे सवाल: सांविधानिक नैतिकता का पालन और आयाराम-गयाराम की संस्कृति
राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन ने आम आदमी पार्टी (आप) के सात राज्यसभा सदस्यों के भाजपा में विलय को मंजूरी दे दी है। आप के सांसद संजय सिंह ने इन सांसदों को बागी करार देते हुए उन्हें अयोग्य घोषित करने के लिए सभापति के पास प्रतिवेदन दिया है, जबकि राघव चड्ढा के अनुसार, संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दो-तिहाई सांसदों के विलय को दल-बदल कानून के अनुसार अयोग्यता का मामला नहीं माना जा सकता। चूंकि, राज्यसभा के सभापति ने सांसदों के विलय को मंजूरी दे दी है, इसलिए उन्हें अब अयोग्य नहीं माना जाएगा। इस दल-बदल से आप पार्टी के राष्ट्रीय दर्जे पर फिलहाल कोई संकट नहीं है। 1967 में हरियाणा के विधायक गयालाल ने एक पखवाड़े में तीन बार दल बदलकर आयाराम-गयाराम की संस्कृति शुरू की थी। चव्हाण समिति और फिर दिनेश गोस्वामी समिति की रिपोर्टों पर राजीव गांधी की सरकार ने 52वें संशोधन से संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी, जिसे दल-बदल विरोधी कानून कहते हैं। मूल कानून के अनुसार, एक-तिहाई विधायक या सांसदों के दल-बदल करने पर उन्हें अयोग्यता के दायरे से बाहर रखा गया। 2003 में 91वें संशोधन के अनुसार, दो-तिहाई सदस्यों को सामूहिक रूप से दल बदलने की कानूनी सहूलियत मिल गई। कर्नाटक के विधायकों के दल-बदल मामले में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस रमन्ना ने नवंबर, 2019 के फैसले में कहा था कि संसदीय लोकतंत्र की सफलता के लिए सरकार और विपक्ष, दोनों को सांविधानिक नैतिकता का पालन करना चाहिए। भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री शांताकुमार ने कहा है कि सेवा और ईमानदारी के बजाय कुर्सी की राजनीति देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। उनके अनुसार, घर में चोरी होने पर आरोपी को सजा मिलती है, लेकिन पूरे घर को लूटने पर कोई सजा नहीं मिल रही। उन्होंने सभी पार्टियों के नेताओं से दल-बदल कानून पर नए सिरे से विचार और बदलाव का आग्रह किया है। लेकिन दल-बदल के मामलों में सांविधानिक नैतिकता के बजाय वर्तमान कानून और अदालत के फैसलों के अनुसार विलय और अयोग्यता का निर्धारण होता है। कुछ कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, आम आदमी पार्टी ने भाजपा में विलय का निर्णय नहीं लिया, इसलिए सात राज्यसभा सांसद दल-बदल कानून के अनुसार, अयोग्यता के दायरे में आ सकते हैं। दसवीं अनुसूची के अनुसार, अयोग्यता मामलों में स्पीकर या सभापति के फैसलों के खिलाफ अदालत में अपील नहीं हो सकती। पर 1992 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सभापति का आदेश न्यायिक पुनरावलोकन के दायरे में आ गया है। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के 37 विधायकों के समूह की मान्यता के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2007 में फैसला दिया था। उसके अनुसार, विधायी दल को मान्यता देने के लिए पार्टी का विघटन और विलय जरूरी है। शिव सेना मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2023 के फैसले में पार्टी और विधायी दल को जोड़कर देखने की बात कही थी। उसके पहले 2019 में गोवा में कांग्रेस के 15 में से 10 विधायकों के भाजपा में शामिल होने के खिलाफ विधानसभा अध्यक्ष ने अयोग्यता की कार्रवाई नहीं की थी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने फरवरी, 2022 के फैसले में कहा कि दो-तिहाई कांग्रेसी विधायकों का भाजपा में विलय कानून सम्मत था और उनके खिलाफ दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता की कार्रवाई नहीं हो सकती। सुप्रीम कोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान विधानसभा के नए चुनाव हो गए। फरवरी, 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक बिंदुओं का निर्धारण किए बगैर उस अपील को डिस्पोज कर दिया। गोवा से जुड़ी दूसरी अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने मार्च, 2025 में नोटिस जारी किया था, जिस पर पक्षकारों को जवाब देना है। आप के सात सांसदों के मामले में सभापति के आदेश को चुनौती दी गई, तो उसे सुप्रीम कोर्ट में पुराने मामले के साथ ही सुना जाएगा। इसके लिए पांच जजों के संविधान पीठ के गठन की मांग उठ सकती है। सुप्रीम कोर्ट में लंबी सुनवाई के बाद फैसला आने तक बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के अनुसार, सातों सांसदों के भाजपा में विलय को कानूनी तौर पर पूर्ण मान्यता रहेगी। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, पंजाब के विधायकों ने दल-बदल नहीं किया, इसलिए इन सांसदों के खिलाफ अयोग्यता की कार्रवाई हो सकती है। लेकिन यह बात कानूनी प्रावधानों के अनुसार तर्कसंगत नहीं दिखती। विधायक और लोकसभा के सांसद जनता द्वारा चुने जाते हैं। दल-बदल के बाद जनप्रतिनिधियों को रिकॉल करने की मांग हो रही है, लेकिन इस बारे में कोई कानून नहीं है। राज्यसभा सदस्यों को विधायकों के प्रतिनिधित्व के आधार पर अयोग्य घोषित करने के लिए संसद से कानून में बदलाव जरूरी है। स्वाति मालीवाल के विद्रोह के बाद दिल्ली में नई विधानसभा का गठन हो चुका है। पंजाब में भी अगले साल नई विधानसभा के गठन के बाद विधायकों में फेरबदल होगा। इसलिए, इन सात सांसदों की अयोग्यता का निर्धारण राज्यों में विधायकों की पार्टी लाइन के अनुसार नहीं हो सकता। राघव चड्ढा ने अगस्त, 2022 में निजी बिल पेश किया था, जिसके अनुसार दल-बदल के लिए दो-तिहाई के बजाय तीन-चौथाई सदस्यों को बढ़ाने की मांग की गई थी, जिसे संसद से मंजूरी नहीं मिली। इसलिए, दो-तिहाई सदस्यों के सामूहिक दल-बदल को वर्तमान कानून के अनुसार विलय के दायरे में मान्यता मिल सकती है। पार्टियों के विलय और विधायक-सांसदों की अयोग्यता का निर्धारण सभापति करते हैं, जिनके सत्ता पक्ष से जुड़े होने की वजह से विवाद और मुकदमेबाजी होती है। विधि आयोग की 255 रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के 2020 के फैसले के अनुसार, अयोग्यता के मामलों के निष्पक्ष और स्वतंत्र ट्रिब्यूनल बनाने की जरूरत है। राजनीतिक दलों में विघटन और चुनाव चिह्न के आवंटन के बारे में चुनाव आयोग को अधिकार है। पार्टियों में पारदर्शिता और सांसदों की जनता के प्रति जवाबदेही बढ़ाने के लिए समुचित कानूनी बदलाव जरूरी हैं। विधायी दल के साथ पार्टियों को जोड़ने के लिए सभी पार्टियों को अपने करोड़ों सदस्य और पदाधिकारियों का खुलासा करना होगा। दल-बदल कानून अगर अपने मकसद में विफल हो रहा है, तो सांविधानिक नैतिकता के अनुसार संसद से नए कानूनी बदलाव जरूरी हैं, ताकि सत्ता के लिए दौड़ के बजाय जनता के लिए, जनता के द्वारा, जनता के शासन के सांविधानिक लक्ष्य के संकल्प को जनप्रतिनिधि सही अर्थों में पूरा कर सकें। edit@amarujala.com
- Source: www.amarujala.com
- Published: Apr 28, 2026, 06:40 IST
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