High Court : अजनबी किसी की जमानत रद्द नहीं करा सकता, हाईकोर्ट ने लगाया 25 हजार का जुर्माना

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कोई भी व्यक्ति जो किसी आपराधिक मामले में न शिकायतकर्ता है और न ही पीड़ित है तो उसे उस मामले में आरोपी की जमानत रद्द करने की मांग करने का अधिकार नहीं है। इस टिप्पणी संग कोर्ट ने जमानत रद्द करने की मांग में दायर अर्जी खारिज कर दी और याची पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। यह आदेश न्यायमूर्ति कृष्ण पहल की एकल पीठ ने निखिल कुमार की अर्जी पर दिया है। गाजियाबाद के साहिबाबाद थाना क्षेत्र निवासी याची निखिल कुमार ने कोर्ट में जमानत रद्द करने के लिए आवेदन दायर किया था। उसने विपक्षी अमीर को हत्या मामले में ट्रायल कोर्ट से मिली जमानत को रद्द करने की मांग की। अधिवक्ता ने दलील दी कि याची के पिता की हत्या अमीर और अन्य आरोपियों ने नौ नवंबर 2017 को तब की, जब वह 2012 के एक मामले में जमानत पर रिहा था। 2017 को हत्या के संबंध में अमीर को मिली जमानत सुप्रीम कोर्ट ने 18 जुलाई 2022 को रद्द कर दी थी और मामला पुनर्विचार के लिए हाईकोर्ट भेज दिया था। याची ने आशंका जताई कि यदि अमीर को पुनः जमानत मिलती है तो याची की हत्या कर सकता है। इसलिए 2012 के मामले में मिली जमानत भी रद्द की जानी चाहिए। प्रतिवादी अधिवक्ता ने दलील दी कि याची 2012 के मामले में न तो गवाह है और न ही शिकायतकर्ता। यह जमानत रद्दकरण आवेदन न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। इसे व्यक्तिगत प्रतिशोध के कारण दाखिल किया गया है। हाईकोर्ट ने पाया कि याची 2012 के मूल मामले के लिए एक बाहरी व्यक्ति है। याची इस मामले में न तो सूचनाकर्ता है और न ही पीड़ित, उसके पास जमानत रद्द करने की मांग करने का कोई अधिकार नहीं है। इस तरह का तुच्छ आवेदन न्याय प्रशासन को बाधित करता है और वकीलों का यह कर्तव्य है कि वे अपने मुवक्किलों को ऐसे व्यर्थ मुकदमेबाजी से रोकें। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता निखिल कुमार के जमानत रद्दकरण आवेदन को खारिज कर दिया।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Nov 29, 2025, 10:48 IST
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