संस्कृति के पन्नों से: इन व्यक्तियों नहीं करना चाहिए अपमान; राजा ययाति ने अपने पुत्र को क्या उपदेश दिया
नहुष के पुत्र राजा ययाति ने शुक्राचार्य के शाप के बाद अपनी वृद्धावस्था अपने सबसे छोटे पुत्र पुरु को देकर उससे उसका यौवन ले लिया था। लेकिन अनेक वर्ष भोग-विलास करने के बाद भी ययाति की कामनाएं तृप्त नहीं हुईं, तो उन्होंने पुरु को उसका यौवन लौटा दिया। फिर वह पुरु की पितृ-भक्ति से प्रसन्न होकर उसे राज्य सौंपकर तपस्या करने वन चले गए। वानप्रस्थ आश्रम का पालन करते हुए वह दीर्घकाल तक तपस्या में लीन रहे। वह प्रतिदिन देवताओं और पितरों का तर्पण करते, अग्निहोत्र करते और शास्त्रों के अनुसार जीवन व्यतीत करते थे। राजा ययाति ने शिलोंछवृत्ति अपनाई, अर्थात जो अन्न यज्ञ के बाद बचता, उसी से अपना निर्वाह करते थे। पहले अतिथियों को फल-मूल देकर तृप्त करते, फिर स्वयं भोजन ग्रहण करते। इस प्रकार तप और संयमयुक्त जीवन जीते हुए एक हजार वर्ष बीत गए। इसके बाद उन्होंने और भी कठोर तप किया। वह तीन वर्षों तक केवल जल पीकर रहे, फिर एक वर्ष तक केवल वायु पर जीवन बिताया। आगे चलकर एक वर्ष तक पांच अग्नियों के बीच बैठकर तपस्या की। फिर छह महीने तक एक पैर पर खड़े होकर केवल वायु का सेवन करते रहे। इस कठिन तप के प्रभाव से उनका यश पृथ्वी और आकाश में फैल गया और अंततः वह स्वर्गलोक को प्राप्त हुए। स्वर्ग में देवताओं ने उनका अत्यंत सम्मान किया। देवगण, मरुद्गण और वसुओं ने उनका आदर किया। वह देवलोक से लेकर ब्रह्मलोक तक विचरण करते हुए दिव्य सुखों का अनुभव करते रहे। एक दिन वह देवराज इंद्र के पास पहुंचे। इंद्र ने उनसे पूछा, राजन ! आपने पुरु को राज्य सौंपते हुए उसे क्या उपदेश दिया था ययाति ने उत्तर दिया, देवराज! मैंने प्रजा की सहमति से पुरु का राज्याभिषेक किया। मैंने पुरु से कहा, बेटा! गंगा और यमुना के बीच का यह मध्यदेश तुम्हारे अधीन रहेगा। तुम इसके राजा होगे और तुम्हारे भाई सीमांत प्रदेशों के शासक होंगे। इसके साथ ही मैंने उसे धर्म और नीति का उपदेश भी दिया।इसके अलावा, मैंने पुरु से कहा, मनुष्य को कभी दीनता, कपट और क्रोध नहीं करना चाहिए। उसे कुटिलता, ईर्ष्या आदि से दूर रहना चाहिए। माता-पिता, विद्वान, तपस्वी और क्षमाशील व्यक्तियों का अपमान नहीं करना चाहिए। शक्तिशाली व्यक्ति क्षमा करता है, जबकि दुर्बल क्रोध करता है। दुष्ट व्यक्ति साधु से, निर्धन धनवान से, कुरूप सुंदर से और अधर्मी धर्मात्मा से द्वेष करता है। यही कलियुग के लक्षण हैं। ययाति ने पुरु को समझाया, क्रोध करने वाले से महान वह है, जो क्रोध नहीं करता। असहनशील से सहनशील श्रेष्ठ है, और मूर्ख से विद्वान श्रेष्ठ होता है। जो अपमान सह लेता है, उसका धैर्य ही अपमान करने वाले को जलाता है और उसका पुण्य भी उसी को प्राप्त होता है। ययाति ने आगे कहा, कभी किसी के हृदय को चोट पहुंचाने वाले शब्द नहीं बोलने चाहिए। कठोर वाणी मनुष्य को पतन की ओर ले जाती है। जो व्यक्ति दूसरों को दुख पहुंचाता है, वह वास्तव में दुर्भाग्यशाली होता है। उसके मुख से निकले शब्द कांटों के समान होते हैं, जो दूसरों के हृदय को घायल करते हैं। इसके बाद ययाति ने मधुर व्यवहार का महत्व बताते हुए कहा, मनुष्य को चाहिए कि वह सभी प्राणियों के प्रति दया और मैत्री का भाव रखे। दान करे और मधुर वाणी बोले। ये तीनों गुण ऐसे हैं, जिनसे समस्त जगत को वश में किया जा सकता है। अंत में वह पुरु से बोले, सदा श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण का अनुसरण करना चाहिए। दुष्टों की कटु बातों को सह लेना चाहिए और अपने व्यवहार को ऐसा बनाना चाहिए कि हर परिस्थिति में लोग सम्मान करें। दूसरों को देना सीखो, पर स्वयं कभी किसी से कुछ न मांगो। इस प्रकार धर्म, संयम, त्याग और मधुर व्यवहार का उपदेश देकर ययाति ने अपने जीवन को महान बनाया। साथ ही, आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक आदर्श स्थापित किया, ताकि समाज में शांति, सद्भाव और धर्म की मर्यादा बनी रहे।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Apr 05, 2026, 07:24 IST
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