गंदगी की टीआरपी ज्यादा है: हास्य या संवेदनहीनता? सोशल मीडिया के दौर में बदलती कॉमेडी पर सवाल
एक समय हास्य समाज को आईना दिखाता था। व्यंग्य सत्ता से सवाल पूछता था, विसंगतियों पर चोट करता था और लोगों को हंसाने के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर करता था। आज भी अच्छे हास्य की यही पहचान है। किंतु, संचार क्रांति और सोशल मीडिया के इस दौर में हास्य का एक ऐसा रूप भी सामने आया है, जो मनोरंजन की सीमा लांघकर संवेदनहीनता, अश्लीलता और सामाजिक मर्यादाओं के क्षरण का माध्यम बनता जा रहा है। ऐसे में, यह केवल कला का प्रश्न नहीं है, बल्कि समाज के चरित्र और उसकी दिशा से जुड़ा हुआ गंभीर विषय है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी का सांविधानिक अधिकार है, पर हम इसकी आड़ में सांविधानिक कर्तव्यों और सामाजिक संरचना को तिलांजलि देने पर उतारू हो जाएं, तो यह कतई न्यायोचित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में यह ट्रेंड देखा गया है कि सोशल मीडिया पर त्वरित लोकप्रियता की भूख ने कंटेंट क्रिएटर, विशेषकर स्टैंड-अप कॉमेडी के नाम पर सामाजिक मर्यादाओं का मानमर्दन किया जा रहा है। दरअसल, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर लोकप्रियता हासिल करने की होड़ ने कंटेंट निर्माण की प्रकृति बदल दी है। पहले जहां रचनात्मकता, विचार और प्रतिभा सफलता का आधार माने जाते थे, वहीं अब चौंकाने वाले, विवादास्पद और उत्तेजक कंटेंट को अधिक महत्व मिलने लगा है। स्टैंड-अप कॉमेडी की दुनिया भी इस प्रवृत्ति से अछूती नहीं रही। कई बार देखा गया है कि कुछ कलाकार सामाजिक मुद्दों पर सार्थक हास्य प्रस्तुत करने के बजाय ऐसी टिप्पणियों का सहारा लेते हैं, जो किसी व्यक्ति, समुदाय, पेशे या मानवीय गरिमा को ठेस पहुंचाती हैं। हाल ही में, एक कॉमेडियन से जुड़ा विवाद इसी व्यापक समस्या की ओर संकेत करता है। सोशल मीडिया पर वायरल हुई कुछ क्लिपों में महिलाओं, सहमति और मृत व्यक्तियों के संदर्भ में की गई टिप्पणियों को लेकर उनकी काफी आलोचना हुई। विशेष रूप से मृत व्यक्तियों के संदर्भ में की गई टिप्पणियां गंभीर नैतिक प्रश्न खड़े करती हैं। किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह जीवित और मृत, दोनों की गरिमा का सम्मान करता है। यदि मनोरंजन के नाम पर मृत व्यक्तियों के शरीर या उनकी स्थिति का मजाक बनाया जाए, तो यह केवल व्यक्तिगत असंवेदनशीलता नहीं, यह सामाजिक मूल्यों के क्षरण का भी संकेत है। असल में, समस्या केवल स्टैंड-अप कॉमेडी तक सीमित नहीं है। इसका संबंध उस डिजिटल संस्कृति से है, जो तेजी से हमारे सामाजिक व्यवहार को प्रभावित कर रही है। भारत में 90 करोड़ से अधिक इंटरनेट और 50 करोड़ से अधिक सोशल मीडिया उपयोगकर्ता हैं। ऐसे में, डिजिटल कंटेंट में दिखाए गए विचार और व्यवहार धीरे-धीरे सामाजिक मानक बन जाते हैं, जिनका सबसे अधिक प्रभाव किशोरों और युवाओं पर पड़ता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। पर, यही संविधान अनुच्छेद 19(2) के माध्यम से यह भी स्पष्ट करता है कि यह स्वतंत्रता पूर्णतः निरंकुश नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता, नैतिकता और अन्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए उचित सीमाएं भी आवश्यक हैं। दुर्भाग्य से आज बहस का स्तर अक्सर इस प्रश्न तक सिमट जाता है कि क्या किसी को बोलने का अधिकार है जबकि असली प्रश्न यह होना चाहिए कि उस अधिकार का उपयोग किस प्रकार किया जा रहा है यदि किसी की अभिव्यक्ति समाज में संवेदनहीनता, अपमान और नैतिक पतन को बढ़ावा देती है, तो उस पर आलोचनात्मक विमर्श होना स्वाभाविक और आवश्यक है। हास्य का स्तर गिरने से समाज का स्तर भी प्रभावित होता है। यदि लोकप्रियता का पैमाना केवल विवाद, अश्लीलता और अपमान बन जाएगा, तो आने वाली पीढ़ियों में संवेदनशीलता, सहानुभूति और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे मूल्य कमजोर पड़ेंगे। आज आवश्यकता प्रतिबंधों से अधिक आत्मनियंत्रण की है। कंटेंट निर्माताओं को समझना होगा कि प्रभावशाली मंच के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी आती है। दर्शकों को मनोरंजन के नाम पर हर सामग्री को स्वीकार करने के बजाय उसके सामाजिक प्रभाव पर विचार करना होगा। हमें यह तय करना होगा कि हम कैसा समाज बनाना चाहते हैं, जो दूसरों की गरिमा पर हंसता हो, या जो हास्य के माध्यम से स्वयं को बेहतर बनाने की प्रेरणा देता हो। किसी भी सभ्यता की पहचान उसकी तकनीकी प्रगति से नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं से होती है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Jun 18, 2026, 03:49 IST
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