Una News: मक्की की खेती से मुंह मोड़ रहे किसान, लावारिस पशु बने मुसीबत
बड़ूही (ऊना)। महंगाई और खेती की लगातार बढ़ती लागत के बीच लावारिस पशु और जंगली जानवर किसानों की मुश्किलें और बढ़ा रहे हैं। किसानों का कहना है कि मक्की तैयार करने में हजारों रुपये खर्च करने के बाद जब फसल खेत में लहलहाने लगती है तो बंदरों के झुंड, लावारिस पशु और सूअर उसे बर्बाद कर देते हैं। स्थिति यह है कि कई किसान अब मक्की की खेती करने से पीछे हटने लगे हैं।ग्रामीण क्षेत्रों में मक्की लंबे समय से किसानों की प्रमुख फसलों में शामिल रही है। किसान इसे घरेलू जरूरतों, पशुओं के चारे और अतिरिक्त आमदनी के लिए उगाते हैं, लेकिन जुताई, बीज, खाद, दवाइयों और मजदूरी का खर्च बढ़ने के साथ फसल की सुरक्षा बड़ी चुनौती बन गई है। किसानों ने कहा कि मक्की की बालियां निकलने के समय बंदर खेतों में पहुंचकर उन्हें तोड़ देते हैं। कई बार बंदरों का झुंड थोड़े समय में ही खेत के बड़े हिस्से को नुकसान पहुंचा देता है। वहीं रात के समय खेतों में पहुंचने वाले जंगली सूअर मक्की को रौंदने के साथ जमीन तक खोद देते हैं। बेसहारा पशु भी खुले में घूमते हुए खेतों में घुसकर खड़ी फसल को नुकसान पहुंचा रहे हैं। किसानों का कहना है कि छोटे किसानों के लिए खेतों के चारों ओर तारबंदी करवाना भी आसान नहीं है। तारबंदी पर भी काफी खर्च आता है, ऐसे में खेती की बढ़ती लागत के साथ फसल सुरक्षा का अतिरिक्त खर्च भी किसानों पर पड़ रहा है। उनका कहना है कि पहले मक्की की खेती घरेलू जरूरतों के साथ आमदनी का भी जरिया थी, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। मक्की की खेती में जुताई, बीज, दवाइयों और मजदूरी पर लगातार खर्च बढ़ रहा है। ऊपर से लावारिस पशु और बंदर फसल को नुकसान पहुंचा देते हैं। ऐसे में लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है। -अशोक कुमार, किसान बड़ूहीलावारिस पशुओं, बंदरों और सूअरों से फसल बचाने के लिए किसानों को दिन-रात खेतों की रखवाली करनी पड़ती है। सरकार को समस्या का स्थायी समाधान करना चाहिए। -श्याम सुंदर, किसान दियाड़ा
- Source: www.amarujala.com
- Published: Aug 12, 2026, 23:35 IST
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