Urdu Poetry: साँप भी बीन भी मदारी भी
साँप भी बीन भी मदारी भी हाए क्या बात है तुम्हारी भी कैसे करते हो यार माइक पर शा'इरी भी दुकान-दारी भी हम वली तो नहीं ख़ुदा से मगर जान-पहचान है हमारी भी सिर्फ़ दिल का मु'आमला ही नहीं 'इश्क़ है एक ज़िम्मे-दारी भी हार कर फूल तेरी ख़ुश्बू से ढूँढ़ लेते हैं रिश्तेदारी भी वो जो पिछली क़तार में ख़ुश था आ गई आज उस की बारी भी हम कभी एक साथ करते थे ख़ाकसारी भी शह-सवारी भी आप ख़ामोशियाँ भी सुनते हैं आह सुन लीजिए हमारी भी ~ फ़हमी बदायूनी हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Aug 10, 2026, 19:36 IST
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