फ़हमी बदायूनी की ग़ज़ल: मुँह में जब तक ज़बान बाक़ी है
मुँह में जब तक ज़बान बाक़ी है आप की दास्तान बाक़ी है तीर तरकश कमान बाक़ी है इस का मतलब उड़ान बाक़ी है आख़िरी वक़्त है 'इबादत का बस मोहब्बत में जान बाक़ी है जी नहीं लग रहा पढ़ाई में और अभी इम्तिहान बाक़ी है वो उसी पर फिराता है निश्तर ज़ख़्म का जो निशान बाक़ी है चाहे मलबे की शक्ल में ही सही तेरा मेरा मकान बाक़ी है यार इसे और डूब जाने दे थोड़ा सा बादबान बाक़ी है ले तो सकता हूँ नाम क़ातिल का मसअला ये है जान बाक़ी है हम नतीजे का इंतिज़ार करें या अभी इम्तिहान बाक़ी है हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें। लिंक पर क्लिक करें और जुड़ें अमर उजाला काव्य के व्हाट्सएपचैनल से https://whatsapp.com/channel/0029VaXoA27A89Mp96alfc2o
- Source: www.amarujala.com
- Published: Oct 28, 2026, 20:02 IST
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