एक्सप्लेनर: जिस लिज्जत पापड़ की कहानी अब एनसीईआरटी में पढ़ाई जाएगी, कैसे शुरू हुआ था उसका सफर?

तारीख 15 मार्च 1959। मुंबई के गिरगांव की एक पुरानी रिहायशी इमारत की छत पर सात महिलाएं इकट्ठा हुईं। उन्होंने पापड़ बनाने का काम शुरू किया। पहले दिन सिर्फ चार पैकेट पापड़ तैयार हुए। शुरुआत के लिए रुपये उधार लिए गए थे। यहीं से एक कहानी शुरू हुई। बदलाव की, सफलता की, आत्मनिर्भरता की। अब ये कहानी एनसीईआरटी की किताब में भी पढ़ाई जाएगी। ये कहानी है श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ की। एनसीईआरटी की कक्षा नौवीं की सामाजिक विज्ञान की नई किताब अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड में इसे शामिल किया गया है। इसे 'विचार से स्टार्टअप तक' अध्याय में उद्यमिता की भारतीय कहानियों के साथ जगह दी गई है। नई किताब में आधुनिक भारत के विकास, व्यक्तिगत वित्त, सरकारी नीतियों, आयकर की गणना और भारतीय कारोबारी मॉडल जैसे विषय भी शामिल किए गए हैं। लिज्जत की कहानी कैसे शुरू हुई इसे शुरू करने वाली महिलाओं को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा संस्थान की मौजूदा स्थिति क्या है आइए जानते हैं सदियों से भारतीय थाली का हिस्सा रहा पापड़ पापड़ भारत के पारंपरिक खाद्य पदार्थों में शामिल है। भारत सरकार के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विकास कार्यालय की परियोजना रिपोर्ट के अनुसार, पापड़ भारतीय आहार में प्राचीन समय से लोकप्रिय रहा है। इसे आमतौर पर दालों के पाउडर, मसालों और नमक से तैयार आटे से बनाया जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में पापड़ के लिए अलग-अलग नाम प्रचलित हैं। पारंपरिक पापड़ को पापड़, पप्पड़, पप्पड़म, अप्पलम और खिचिया जैसे नामों से जाना जाता है। समय के साथ पापड़ के आधुनिक रूपों में भी कई तरह के आकार और प्रकार सामने आए। अलग-अलग क्षेत्रों में इन्हें पापड़, फ्रायम्स, भुंगला, नड्डा, गोंगो, पोंगा, गोल्ड फिंगर, व्हाइट फिंगर, फिंगर और नली जैसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Sep 30, 2026, 19:47 IST
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