गुलाल से मलाल को मिटाइए: वक्त बदला, सदियां बीतीं; होली की मूल भावना नहीं बदली
लगभग अस्सी बरस हो गए, जबसे मैं हर साल यह पंक्ति सुनता आ रहा हूं, होली है भाई, होली है। पांच-छह बरस की उम्र से इस पंक्ति का संगीत कानों में पड़ना शुरू हुआ था। तब से मैं जिन-जिन शहरों में रहा, यह पंक्ति साथ रही, यानी तमाम पीढ़ियां होली का सुंदर त्योहार मानती आई हैं और उसके महत्व को बचपन से ही जान लेती हैं। बच्चे पानी वाले रंग फेंकते हैं, पिचकारियां चलाते हैं, बेशक उनकी डिजाइनें बदल गई हैं, पर त्योहार की मूल भावना नहीं बदली। यह त्योहार है ही ऐसा। इसमें एक-दूसरे को प्रेम-स्नेह-सौहार्द्र के रंग में रंगने की परंपरा है। रंग अपने आप में बहुत बड़ी चीज है, चाहे वे फूलों के हों या संस्कृति या कला या जीवन में जिस रूप में हों, वे सारे रंग होली में दिखाई पड़ते हैं। मिनिएचर पेंटिंग्स के दिनों से होली किसी न किसी रूप में चित्रित होती रही है। भारतीय मूल के कलाकार अनीश कपूर ने तो अपनी कला यात्रा ही शुरू की थी रंग और गुलाल की ढेरियों से। उन्होंने जब अपनी कलाकृतियां रचीं, तो रंगों से ही रचीं। बॉलीवुड में एक जमाने की तमाम फिल्मों में होली अनिवार्य रूप से रहती थी। निर्माताओं-निर्देशकों को पता था कि होली को फिल्म में शामिल करने पर फिल्म चमक उठेगी। बहुत-से होली के फिल्मी गीत याद आ रहे हैं, जो फिल्मों के दौरान गाए गए हैं। अमिताभ बच्चन की आवाज में हर साल गलियों-सड़कों में सुनाई पड़ता है, रंग बरसे। यह जो रंग का बरसना है, हमारे जीवन में इसका बहुत बड़ा आकर्षण है। यह रंग सबको प्रिय है। रंग देखते ही हम सबको खुशी होती है। रंगों का यह त्योहार अद्भुत है। हमारे इस त्योहार को विदेशों में भी लोग बड़ी उत्सुकता से देखते हैं। आप किसी को रंग से भिगो दे रहे हैं, सारे कपड़े गीले हो जाते हैं। रंगों की पोटली के साथ एक-दूसरे से मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और खाते-पीते हैं। हमारे यहां हर त्योहार के अपने खास व्यंजन भी हैं। होली हमारी जीवन-शैली में शामिल है। हमारे संगीत में, नृत्य में, नाटक में यह त्योहार उभरता रहा है। रतन थियाम जैसे मणिपुर के बड़े निर्देशक ने जब कालिदास का ऋतुसंहार नाटक किया, तो एक दृश्य में वह किसी न किसी प्रसंग में होली जैसा दृश्य ले आए। क्या सुंदर दृश्य रचा उन्होंने! साहित्य के क्षेत्र में भी होली पर खूब लिखा गया है। जयशंकर प्रसाद जी की कविता है होली की रात। चांदनी धुली हुई हैं आज/बिछलते हंै तितली के पंख।/सम्हलकर, मिलकर बजते साज/मधुर उठती हैं तान असंख्य। उसके बड़े गहरे अर्थ हैं। कवि मंगलेश डबराल और हम तमाम मित्र एक-दूसरे के घर जाते थे और रंग लगाते थे। हमारे यहां तो संगीत की दुनिया में होली एक विशेष चीज रही है। हमारे लोकगीतों का सहारा लेकर बड़े संगीतकारों ने बहुत-सी चीजें गाई हैं। यह त्योहार जिस ऋतु में आता है, वह वसंत की ऋतु है। बौर आते हैं, तो एक उम्मीद बंधती है कि अब आम आएंगे। अभी मुंबई में हूं, किसी भी शहर में जाता हूं, आम के बौर देखता हूं। आप जिधर नजर उठाएंगे, उधर वसंत के फूल हैं। सर्दियों के फूल जाने लगते हैं और नए आने लगते हैं। और फिर होली राधा-कृष्ण के प्रेम-प्रसंग तथा होलिका दहन से भी जुड़ी है। होलिका दहन का प्रसंग बताता है कि बुराई पर अच्छाई के विजय का पर्व है यह। प्रह्लाद की जीत होती है और होलिका का दहन होता है। होली की यात्रा अनंत है। यह उल्लास और उमंग भरती है। संदेश देती है, मिल-जुलकर रहने का। यह दूरियों को पाटने का पर्व है। किसी मलाल की वजह से बहुत दिनों से नहीं मिले, तो होली के गुलाल से मलाल को मिटा दीजिए। आज इसकी जरूरत ज्यादा हो गई है कि हम इसके बारे में नई पीढ़ी को बताएं कि इसका वास्तविक महत्व क्या है। यह शोर-शराबे या हुड़दंग का त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम और शांति-सद्भाव के रंग में रंगने का त्योहार है। मथुरा और वृंदावन में जिस तरह की होली होती है, वैसी होली कहीं और नहीं होती। समय के साथ परंपराओं में भी परिष्कार होते रहते हैं। अब लट्ठमार होली की जरूरत नहीं है, प्रेम से होली खेलने की जरूरत है, क्योंकि वह समय दूसरा था, परंपराएं अलग थीं, समाज अलग था। अब होली इस तरह मनानी चाहिए, जिससे किसी को आपत्ति न हो। कई बार सुनने में आता है कि होली के दिन नशीले पदार्थ खिला दिए, पर यह नहीं होना चाहिए। मैं युवाओं से कहना चाहूंगा कि ऐसे रंगों या ऐसी चीजों का इस्तेमाल मत करिये, जो जल्दी मिटती नहीं हैं या सेहत को हानि पहुंचाती हैं। यह कोई सजा देने का त्योहार नहीं है। हुरियारों की टोली चलती थी पहले, वह अब खत्म होती जा रही है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि आंगन वाले घर खत्म हो गए। पहले एक रंग लेकर बाहर आता था, तो दूसरा भी निकल आता था। पर अब आप दिल्ली, मुंबई और नोएडा में चौबीस मंजिल के फ्लैट में रहते हैं, तो कहां वैसी होली खेल पाएंगे। पहले होली होती थी, घर के बाहर, गांव की चौपाल पर। एक जमाने में शहरों और गांव में होली मनाने में बहुत फर्क नहीं था। लेकिन अब वैसा नहीं दिखता, जो अखरता है। फिर भी होली पूरी तरह से खत्म न हो, हम यही कामना करते हैं, क्योंकि यह बहुत ही सुंदर त्योहार है। जो नहीं खेलते होली, उन्हें भी होली का दृश्य देखने में आनंद आता है। हमारे ही समाज में कुछ खास समुदाय होली नहीं खेलता, तो उसमें क्या है, वे केवल देखने आते हैं, तो उन्हें देखने देना चाहिए। होली सामूहिकता का पर्व है, यह भावना बनी रहनी चाहिए, तभी उसका उल्लास और उमंग बना रहेगा। बाजारवादी संस्कृति ने हमारे त्योहारों को दूषित कर दिया है। मुनाफाखोरी और प्रलोभन की बाजारू संस्कृति ने इन सुंदर त्योहारों को मिलावटी चीजों से बदरंग कर दिया है। मैं बाजार के खिलाफ नहीं हूं, बाजार के इस लालच के खिलाफ हूं। रोजमर्रा की वस्तुओं से लेकर त्योहार की चीजों में भी धड़ल्ले से मिलावट हो रही है। यहां तक इन मुनाफाखोरों ने रंगों को भी नहीं छोड़ा है। रंगों का यह रंगीला त्योहार हमारी परंपरा का लालित्य रूप है। यह ललित त्योहार है, जिसमें संबंधों की मधुरता है। हमारे समाज में स्त्रियां भी आदर और प्रेम से, हल्के कोमल स्पर्श से रंग लगाती थीं। जो लोग रंग नहीं खेलते, वे अच्छे कपड़े पहनकर शाम को अबीर-गुलाल लगाने पड़ोसियों, मित्रों के घर जाते हैं। मैं सभी से कह रहा हूं कि जहां भी होली मनाइए, प्रेम से मनाइए, ताकि इसका लालित्य कायम रहे।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Mar 04, 2026, 06:03 IST
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