डॉ.ओम निश्चल: कभी वो दिन थे कि मौसम भी आशिकाना था
कभी वो दिन थे कि मौसम भी आशिकाना था नदी - किनारे अपना भी आशियाना था अभी तो आग उठ रही है यहॉं सूरज की कभी यहीं पे दरख्तों का शामियाना था जल के सौदागरों ने बॉंध लिया है पानी वगरना यहीं पे दरिया का इक ठिकाना था अभी तो आंख में थोड़ी - सी नमी बाकी है नहीं रहेगी तो कहोगे कि इक फ़साना था धरा के थन को दुह रहे हैं जो खुले हाथो कहेंगे किससे यहाँ जल का इक खज़ाना था वो दिन भी दूर नहीं लोग कहेंगे--- पानी और पानी कहेगा , 'अपना भी ज़माना था।' खड़े हैं आज फिर इक युद्ध के मुहाने पर जहां पर अम्न-ओ-चैन का कभी ठिकाना था हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Jun 05, 2026, 19:04 IST
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