संवाद जरूरी है, मगर सीमा भी... लोकतंत्र में विरोध और व्यवस्था के बीच कैसे बने संतुलन?

लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि सरकार हर मांग मान नहीं सकती, लेकिन हर मांग को अनसुना भी नहीं कर सकती। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद और निर्णय, दोनों की अपनी-अपनी सीमाएं हैं। सरकार किसी मांग को स्वीकार कर सकती है, अस्वीकार कर सकती है, उसके विरुद्ध तर्क दे सकती है या कोई वैकल्पिक रास्ता सुझा सकती है। लेकिन यदि संवाद की जगह मौन ले ले, तो असहमति अक्सर अविश्वास में बदल जाती है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के आंदोलन के बीच सरकार पर आरोप लगा कि उसने संवाद के बजाय मौन का रास्ता चुना और इसी कारण एक सामान्य आंदोलन व्यापक जनाक्रोश में बदल गया। उल्लेखनीय है कि नीट पेपर लीक के मुद्दे पर 28 जून को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का आंदोलन जंतर-मंतर पर शुरू हुआ। उस समय तक सरकार नीट की पुनर्परीक्षा करा चुकी थी। संभवतः इसी वजह से शुरुआती दिनों में वहां गिने-चुने छात्र ही पहुंचे। लेकिन छात्रों के समर्थन में भूख हड़ताल पर बैठे पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की बिगड़ती तबीयत ने आंदोलन को नया मोड़ दे दिया। पुलिस कार्रवाई के बाद आंदोलन और उग्र हो गया। इस बीच विपक्षी दलों को सरकार पर हमला बोलने का अवसर मिल गया और उन्होंने भी आंदोलन को तेज करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 21 जुलाई को राहुल गांधी सैकड़ों कार्यकर्ताओं और अन्य विपक्षी नेताओं के साथ प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरने पर पहुंच गए। दरअसल, ऐसे आंदोलनों के समय सरकारों की सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि वे प्रदर्शनकारियों के सामने कब और कितना झुकें तथा दबाव की राजनीति को कितनी मान्यता दें। इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण पोट्टि श्रीरामुलु का आंदोलन है। उन्होंने 19 अक्तूबर, 1952 को अलग आंध्र राज्य की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का मानना था कि यदि सरकार किसी अनशन के दबाव में निर्णय लेने लगे, तो शासन चलाना कठिन हो जाएगा। सात दिसंबर को उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति को लिखे पत्र में कहा था कि केवल इसलिए कोई मांग नहीं मानी जा सकती क्योंकि कोई व्यक्ति उपवास पर बैठा है, चाहे उसके परिणाम कितने भी गंभीर क्यों न हों। लेकिन जैसे-जैसे अनशन लंबा खिंचा, सरकार की चिंता बढ़ती गई। नौ दिसंबर को नेहरू ने संसद में अलग आंध्र राज्य की दिशा में कदम उठाने की बात कही, लेकिन 15 दिसंबर को श्रीरामुलु का निधन हो गया। इसके बाद हिंसा भड़की और 19 दिसंबर को सरकार ने अलग आंध्र राज्य के गठन की घोषणा कर दी। सरकार का तर्क अपनी जगह था, लेकिन इतिहास एक कठिन प्रश्न छोड़ गया—क्या जो भरोसा मृत्यु के बाद दिया गया, वह पहले नहीं दिया जा सकता था डॉ. भीमराव आंबेडकर की 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में दी गई चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती है। उन्होंने कहा था, "हमें अपने सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीकों का दृढ़ता से पालन करना चाहिए। इसका अर्थ है कि हमें सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह के तरीकों को त्यागना होगा। जहां संवैधानिक तरीके खुले हैं, वहां इन असंवैधानिक तरीकों का कोई औचित्य नहीं हो सकता। ये तरीके अराजकता के सिद्धांत के सिवाय कुछ नहीं हैं और इन्हें जितनी जल्दी त्याग दिया जाए, उतना ही बेहतर है।" हालांकि, उनकी इस चेतावनी का अर्थ संवाद से इनकार करना नहीं था। राजनीतिक दल इस बात को अच्छी तरह समझते हैं, लेकिन राजनीति का एक पहलू अवसरवाद भी है। दिलचस्प बात यह है कि अन्ना आंदोलन के दौरान 26 अगस्त, 2011 को लोकसभा में राहुल गांधी ने कहा था कि भूख हड़ताल के जरिए संसद पर दबाव बनाकर कानून बनवाना लोकतंत्र के लिए खतरनाक मिसाल होगी। उनका कहना था कि यदि हर मुद्दे पर संसद को इस तरह बाध्य किया गया, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं का संतुलन बिगड़ सकता है। लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी समस्या का समाधान संवाद के बिना संभव है जर्मन दार्शनिक जुर्गेन हैबरमास का मानना था कि लोकतांत्रिक निर्णयों की वैधता केवल बहुमत से नहीं, बल्कि सार्वजनिक संवाद से भी आती है। ऐसा नहीं है कि सरकार को संवाद का महत्व पता नहीं है। लेकिन उसे यह आशंका भी रहती है कि यदि एक आंदोलन से बातचीत शुरू की गई, तो हर समूह अपनी मांग मनवाने के लिए धरने का रास्ता अपना सकता है। कभी वह भीड़, मीडिया और चुनावी असर का आकलन करती है, तो कभी उसे लगता है कि आंदोलन अपने आप शांत हो जाएगा। कई बार यह प्रश्न भी उठता है कि आखिर संवाद किससे किया जाए गौरतलब है कि एक समय में आसमान में हजारों विमान उड़ते हैं, लेकिन वे टकराते नहीं क्योंकि पायलट, रडार और एयर ट्रैफिक कंट्रोल के बीच लगातार संवाद और समन्वय बना रहता है। यदि कोई पायलट निर्देश मानने से इनकार कर दे, तो दुर्घटना लगभग तय है। दरअसल, संवाद तभी संभव है, जब व्यवस्था बनी रहे। यदि कोई पक्ष संवैधानिक और व्यवस्थागत तरीकों के बजाय अराजक तरीकों से अपनी मांगें मनवाने की कोशिश करेगा, तो उसके साथ सार्थक संवाद कठिन हो जाएगा। अराजकता संवाद की भाषा नहीं हो सकती। इतिहास के सफल आंदोलनों को देखें तो उनके पीछे वर्षों का संघर्ष और व्यापक जनसमर्थन दिखाई देता है। हालांकि, नीट पेपर लीक के विरोध में हुआ आंदोलन कई मायनों में अलग रहा। इसमें नीट से जुड़े कितने विद्यार्थी वास्तव में शामिल थे, यह अलग प्रश्न है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि आने वाले समय में सरकार को ऐसे और आंदोलनों का सामना करना पड़ सकता है। दुनिया के कई देशों में युवाओं के नेतृत्व वाले आंदोलनों ने राजनीतिक बदलाव की पटकथा लिखी है। बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल इसके हालिया उदाहरण हैं। लेकिन क्या भीड़ के दबाव से उभरे वे मॉडल आज सफल और स्थिर लोकतंत्र के उदाहरण हैं यह प्रश्न अभी भी विचारणीय है। इस छात्र आंदोलन ने सोशल मीडिया एल्गोरिद्म के प्रभाव को भी सामने रखा, जो अक्सर लोगों को पूरी वास्तविकता नहीं, बल्कि उनकी पसंद के अनुरूप उसका एक छोटा हिस्सा ही दिखाता है। ऐसे में विरोध कर रहे व्यक्ति को यह भ्रम हो सकता है कि पूरा देश उसके साथ खड़ा है। जबकि लोकतंत्र भ्रम और अराजकता से नहीं, बल्कि तथ्य, धैर्य, संवैधानिक मर्यादाओं और निरंतर संवाद से मजबूत होता है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jul 29, 2026, 02:47 IST
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