बच्चों की सुरक्षा की खातिर: डीपीडीपी नियमों की औपचारिक अधिसूचना निर्णायक बदलाव का प्रतीक

विभिन्न न्यायक्षेत्रों और कानूनी परंपराओं में एक सिद्धांत सर्वमान्य रहता है। राज्य का यह कर्तव्य है कि वह बच्चों को संभावित नुकसान से बचाए। यह मात्र औपचारिक दायित्व नहीं, बल्कि घरेलू कानूनों, सांविधानिक सिद्धांतों और अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर आधारित एक बाध्यकारी कानूनी जिम्मेदारी है। भारत सरकार ने अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए डिजिटल व्यक्तिगत डाटा संरक्षण (डीपीडीपी) अधिनियम, 2023 लागू किया है। यह अधिनियम बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रावधान करता है। यह अधिनियम डाटा ट्रस्टी को बच्चों की ट्रैकिंग या व्यवहार निगरानी करने या बच्चों को लक्षित विज्ञापन देने से भी रोकता है। भारत के इस अधिनियम के तहत, डाटा फिड्यूशरी यानी डाटा ट्रस्टी कोई भी व्यक्ति (व्यक्तिगत, कंपनी या संस्था) होता है, जो किसी के व्यक्तिगत डाटा (सामग्री) को संग्रह करने का उद्देश्य (क्यों) और साधन (कैसे) तय करता है। यानी डाटा संग्रह, उपयोग और भंडारण के लिए निर्णय लेने वाला, जैसे कि कोई ई-कॉमर्स साइट या बैंक। 14 नवंबर, 2025 को अधिसूचित डिजिटल व्यक्तिगत डाटा संरक्षण (डीपीडीपी) नियम, 2025 डिजिटल व्यक्तिगत डाटा के जिम्मेदार उपयोग के लिए एक स्पष्ट और नागरिक केंद्रित ढांचा तैयार करते हैं। ये नियम व्यक्तिगत अधिकारों और वैध डाटा प्रसंस्करण को समान महत्व देते हैं। इनका उद्देश्य डाटा के अनधिकृत व्यावसायिक उपयोग पर अंकुश लगाना, डिजिटल नुकसान को कम करना और नवाचार के लिए सुरक्षित वातावरण बनाना है। ये भारत को एक मजबूत और विश्वसनीय डिजिटल अर्थव्यवस्था बनाए रखने में भी मदद करेंगे। ये नियम ऐसे समय में आए हैं, जब बच्चों की डिजिटल उपस्थिति तेजी से बढ़ रही है। डीपीडीपी नियमों की औपचारिक अधिसूचना एक निर्णायक बदलाव का प्रतीक है, जो स्कूलों, कॉलेजों, एडटेक कंपनियों और शिक्षा बोर्डों को राष्ट्रीय अनुपालन ढांचे के अंतर्गत लाती है। डाटा एकत्र करने वाले किसी भी संगठन, स्कूल या एडटेक कंपनी को डाटा न्यासी कहा जाता है। 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति के व्यक्तिगत डाटा को एकत्र या उपयोग करने से पहले उसे माता-पिता की सत्यापित सहमति प्राप्त करनी होगी। यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि आज बच्चे ऑनलाइन दुनिया में निरंतर डिजिटल निगरानी का सामना कर रहे हैं। डाटा ट्रस्टी बच्चों के डाटा को संभालते समय बेहतर सुरक्षा उपायों को लागू करने के लिए भी जिम्मेदार होता है, जिसमें डाटा को केवल आवश्यक और परिभाषित उद्देश्यों के लिए संसाधित करना और तीसरे पक्ष के साथ साझा करने में पारदर्शिता बनाए रखना शामिल है। डीपीडीपी अधिनियम बच्चों के व्यवहार पर नजर रखने और लक्षित विज्ञापन देने पर भी रोक लगाता है, जिससे यह बात पुष्ट होती है कि व्यावसायिक हित किसी बच्चे के सुरक्षित डिजिटल वातावरण के अधिकार से ऊपर नहीं हो सकते। डीपीडीपी अधिनियम के तहत अनुपालन की निगरानी करने, उल्लंघनों की जांच करने और बच्चों के डाटा की गोपनीयता से संबंधित उल्लंघनों के लिए दंड लगाने हेतु एक डाटा संरक्षण बोर्ड की स्थापना भी की जाएगी। इसके लिए कई संस्थानों को मौजूदा प्रक्रियाओं का ऑडिट करना, सहमति प्रपत्रों को फिर से तैयार करना और विभिन्न प्रणालियों में शिक्षार्थी जानकारी एकत्र और साझा करने के तरीकों पर पुनर्विचार करना आवश्यक होगा। डाटा न्यासी के लिए अधिकांश दायित्व, जिनमें माता-पिता की सत्यापित सहमति, सुरक्षा उपाय, उल्लंघन की सूचनाएं, डाटा न्यूनीकरण और बच्चों के डाटा के प्रसंस्करण पर प्रतिबंध शामिल हैं, 18 महीने बाद लागू होंगे। कुछ संगठन और उद्देश्य माता-पिता की सहमति अनिवार्यता और ट्रैकिंग तथा व्यवहार निगरानी पर प्रतिबंधों से मुक्त हैं, जैसे कि नैदानिक संस्थान, मानसिक स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवा पेशेवर, संबद्ध स्वास्थ्य सेवा पेशेवर, शैक्षणिक संस्थान, शैक्षणिक संस्थानों के लिए परिवहन सेवा प्रदाता, क्रेच और बाल देखभाल केंद्र, ईमेल खाता बनाने के लिए और यह सुनिश्चित करने के लिए कि बच्चे अपनी भलाई के लिए हानिकारक जानकारी तक न पहुंच सकें। बाल संरक्षण से संबंधित इन नियमों के उचित कार्यान्वयन के परिणाम को तीन कारक प्रभावित करेंगे। पहला, माता-पिता की अपने बच्चों के डाटा के लिए जागरूक संरक्षक के रूप में कार्य करने की क्षमता और इच्छाशक्ति। दूसरा, स्कूल अक्सर उचित जांच-पड़ताल किए बिना डिजिटल कार्यों को विक्रेताओं को आउटसोर्स कर देते हैं। अगले 18 महीनों में, उन्हें यह पता लगाना होगा कि छात्र डाटा कहां से एकत्र किया जाता है और कहां प्रवाहित होता है, विक्रेताओं के साथ अनुबंधों पर पुनर्विचार करना होगा, सुरक्षित डाटा भंडारण सुनिश्चित करना होगा और शिक्षकों को डाटा जोखिमों की पहचान करने के लिए प्रशिक्षित करना होगा। तीसरा, प्रभावी कार्यान्वयन डाटा संरक्षण बोर्ड की स्वायत्तता, संसाधनशीलता और सुलभता पर निर्भर करेगा। नियामक में साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों और गोपनीयता इंजीनियरों जैसी विशेष प्रतिभाओं को शामिल किया जाना चाहिए। इसे एक आंतरिक डिजिटल फोरेंसिक इकाई द्वारा समर्थित किया जाना चाहिए, जो डाटा लीक की जांच करने, अनधिकृत पहुंच का पता लगाने और एल्गोरिदम प्रोफाइलिंग की जांच करने में सक्षम हो। सोशल मीडिया बच्चों को जुड़ाव और रचनात्मकता के अवसर प्रदान कर सकता है, लेकिन इसके गंभीर जोखिम भी हैं। बाल यौन अपराधी अक्सर बच्चों तक पहुंचने के लिए इन प्लेटफॉर्मों का दुरुपयोग करते हैं। भारत में किशोरों के बीच सोशल मीडिया के उपयोग के प्रभावी नियमन के लिए एक सम्यक दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जो डिजिटल सहभागिता के सकारात्मक पहलुओं तक पहुंच के साथ-साथ सुरक्षा को भी संतुलित करे। डिजिटल साक्षरता, माता-पिता का मार्गदर्शन, आयु-उपयुक्त प्लेटफार्म सुविधाएं और चरणबद्ध पहुंच को शामिल करते हुए एक सूक्ष्म नियामक ढांचा लागू करने से किशोरों की सुरक्षा में मदद मिल सकती है। इसके लिए नीति निर्माताओं, शिक्षकों, अभिभावकों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को शामिल करते हुए एक सहयोगात्मक रणनीति आवश्यक है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि युवा उपयोगकर्ताओं के लिए आयु-विशिष्ट गोपनीयता सेटिंग्स, सामग्री नियंत्रण और सहायता संसाधन आसानी से उपलब्ध हों। कुल मिलाकर, डीपीडीपी नियम, डीपीडीपी अधिनियम को संचालन में स्पष्टता प्रदान करते हैं और भारत में डाटा सुरक्षा के लिए एक संरचित ढांचा तैयार करते हैं।edit@amarujala.com

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jan 20, 2026, 06:47 IST
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