एयरफोर्स की गोल्डन एरो: कारगिल युद्ध में की थी हवाई जासूसी, चांद की रोशनी में बरसाए थे बम
इंडियन एयरफोर्स की सबसे खतरनाक माने जाने वाली स्क्वाड्रन नंबर 17 गोल्डन एरो इन दिनों खासी चर्चा में है। ऑपरेशन सफेद सागर : द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ द कारगिल वॉर वेब सीरीज के बाद एक बार फिर इस स्क्वाड्रन के पराक्रम को सलाम किया जा रहा है। कारगिल युद्ध के दौरान इस स्क्वाड्रन की कमान संभाल रहे पूर्व वायुसेना प्रमुख बीएस धनोआ भी खासे उत्साहित हैं। दरअसल, पहाड़ों पर छिपे दुश्मन की पहचान करना, उसकी पोजीशन की फोटो रिकॉनिसेंस करना (दुश्मन के ठिकानों की टोह लेने के लिए फोटो लेना), हवाई हमलों के लिए लक्ष्य उपलब्ध कराना, हमलों के बाद उनका आकलन करना और जरूरत पड़ने पर खुद स्ट्राइक मिशन करना यह थी कारगिल युद्ध में गोल्डन एरो की भूमिका। धनोआ कहते हैं कि यह सबसे चुनौतीपूर्ण मिशन था, जिसे इंडियन एयरफोर्स के जांबाजों ने बखूबी निभाया।अंबाला में ही इंडियन एयरफोर्स ने 1 अक्तूबर 1951 में इस स्क्वाड्रन का गठन किया था। यह स्क्वाड्रन उस वक्त भी टोही विमान हार्वर्ड-11 बी विमान संभालती थी। यानी शुरुआत दौर से ही गोल्डन एरो का मिशन सामरिक टोह (दुश्मन के अड्डों की हवाई जासूसी) से जुड़ा था। साल 1955 में इस स्क्वाड्रन ने वैम्पायर, 1957 में हॉकर हंटर व 1975 में मिग 21-एम का बेड़ा संभाला। साल 1999 के कारगिल युद्ध में ऑपरेशन सफेद सागर के दौरान भी गोल्डन एरो ने मिग 21-एम लड़ाकू विमानों का उपयोग करके फोटो-रिकॉनिसेंस (हवाई टोह) और स्ट्राइक मिशनों को अंजाम दिया था।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Aug 12, 2026, 21:55 IST
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