नागरिक न्याय के लिए यात्रा करे जरूरी नहीं, न्याय भी कर सकता है यात्रा : विक्रम

धर्मशाला। मौलिक अधिकारों के साथ नागरिकों को मौलिक कर्त्तव्यों का निर्वहन करना भी आवश्यक है। नागरिक केवल अपने अधिकारों को ही मांगे और कर्त्तव्यों का निर्वहन न करे, ऐसा संविधान में नहीं बताया गया है। सशक्त, समर्थ एवं समरस समाज का निर्माण ही संविधान का लक्ष्य है। यह बात शनिवार को धर्मशाला में आयोजित विशाल विधिक साक्षरता शिविर में न्यायाधीश उच्चतम न्यायालय एवं कार्यकारी अध्यक्ष राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण विक्रम नाथ ने कही। उन्होंने संविधान में नागरिकों को दिए गए अधिकारों और उनके कर्तव्य के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि हिमाचल की भाैगोलिक स्थिति ऐसी है कि लोगों को न्याय पाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। ऐसे में नागरिक न्याय के लिए पहुंचे, यह जरूरी नहीं है, न्याय भी व्यक्ति के लिए यात्रा कर सकता है, यही विधिक सेवा प्राधिकरण का उद्देश्य है। संविधान नागरिकों को समानता बताता है और प्रत्येक व्यक्ति विधि के लिए एक समान है। उन्होंने संतुलित निर्माण पर भी चिंता जताई और कहा कि विकास होना चाहिए, लेकिन यह विवेकपूर्ण हो। पर्यावरण को सुरक्षित और संरक्षित करने से भविष्य को सुरक्षित करना है। प्रकृति से जो हमें मिलता है, वो हमारा अधिकार ही नहीं है, बल्कि कर्तव्य भी बनता है कि इसे संरक्षित, साफ और सुरक्षित रखा जाए। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में अभिव्यक्ति की आजादी की बात होती है और इंटरनेट-सोशल मीडिया पर लोग अपनी बातों को रखते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो सभी का अधिकार है लेकिन इसके साथ यह भी कर्तव्य बनता है कि दूसरों की गरिमा का भी ध्यान रखा जाए। विधिक साक्षरता शिविर में आपदा प्रभावित परिवार को विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से राहत राशि प विधिक साक्षरता शिविर में आपदा प्रभावित परिवार को विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से राहत राशि प

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jun 06, 2026, 20:39 IST
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