रफ्तार के विरुद्ध धैर्य का उत्सव: आईपीएल में यादें ठहरती नहीं, बस गुजरती हैं; टेस्ट में ठहराव गहराई देता है
मैं कर्नाटक राज्य क्रिकेट संघ का सदस्य हूं और चिन्नास्वामी स्टेडियम से कुछ ही दूरी पर रहता हूं। फिर भी इस वर्ष के इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के उद्घाटन मैच के दौरान मैं घर पर था। न तो मैं स्टेडियम गया और न ही टेलीविजन पर मैच देख रहा था। इसके बजाय मैं क्रिकेट पर लिखी एक नई पुस्तक पढ़ रहा था- एक ऐसी पुस्तक, जो आईपीएल की चमक-दमक से बिल्कुल अलग तरह के क्रिकेट की बात करती है। यह पुस्तक थी 500 डिक्लेयर : द जॉयज ऑफ कवरिंग 500 क्रिकेट टेस्ट्स, जिसे स्किल्ड बेरी ने लिखा है। सबसे पहले 500 टेस्ट मैच देखने का रिकॉर्ड महान रिची बेनो के नाम था, जिनमें से 63 उन्होंने खिलाड़ी के रूप में खेले थे और बाकी उन्होंने पत्रकार और कमेंटेटर के रूप में देखे। स्किल्ड बेरी इस उपलब्धि को हासिल करने वाले दूसरे व्यक्ति हैं और इंग्लैंड के 500 टेस्ट मैचों को कवर करने वाले पहले पत्रकार भी। उन्होंने कई प्रतिष्ठित अखबारों के लिए काम किया है और उनका अनुभव इस पुस्तक में साफ झलकता है। यह पुस्तक समय के साथ सहजता से यात्रा करती है- 1973 में ट्रेंट ब्रिज पर इंग्लैंड और न्यूजीलैंड के मैच से लेकर 2024 में रावलपिंडी में इंग्लैंड के दौरे तक। इस यात्रा के दौरान लेखक न केवल मैचों के रोमांचक क्षणों को याद करते हैं, बल्कि विभिन्न देशों के दर्शकों, संस्कृतियों और वातावरण का भी जीवंत चित्रण करते हैं। वे सिर्फ क्रिकेट तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समाज और संस्कृति पर भी सूक्ष्म टिप्पणियां करते हैं। उदाहरण के तौर पर वे बंगाल की तुलना इटली से करते हैं- दोनों जगहों की साहित्यिक परंपरा और भोजन के प्रति प्रेम को जोड़ते हुए। बेरी ने अपने कॅरिअर की शुरुआत कैंब्रिज विश्वविद्यालय के दिनों में की थी। उन्होंने 1970 के दशक के इंग्लिश क्रिकेट पत्रकारों के शानदार चित्र खींचे हैं; जिनमें जॉन अर्लांट, जॉन वुडकॉक और ई.डब्ल्यू. स्वांटन शामिल हैं। उनके लेखन में हास्य भी है और आलोचनात्मक दृष्टि भी। वे बाद के दौर के खिलाड़ियों जैसे इयान चैपल, जेफ्री बॉयकॉट, डेविड गॉवर और केविन पीटरसन के व्यक्तित्व और खेल दोनों का संतुलित विश्लेषण करते हैं। इस पुस्तक की एक खास विशेषता यह है कि लेखक क्रिकेट की तकनीकी बारीकियों को गहराई से समझते हैं। वे बताते हैं कि हेलमेट के आगमन ने खेल को किस तरह बदल दिया। शुरू में हेलमेट तेज गेंदबाजी से बचने के लिए लाए गए थे, लेकिन बाद में उन्होंने स्पिन गेंदबाजी के खिलाफ बल्लेबाजों को अधिक आक्रामक बना दिया। पहले बल्लेबाज सिर पर चोट लगने के डर से जोखिम भरे शॉट नहीं खेलते थे, लेकिन ग्रिल और वाइजर लगे हेलमेट आने के बाद उन्होंने स्वीप, रिवर्स स्वीप और अन्य आक्रामक शॉट खेलने शुरू कर दिए। लेखक की शैली में हास्य भी है। कानपुर के ग्रीन पार्क मैदान के बारे में वे लिखते हैं कि यह शहर के बीचों बीच एकमात्र जगह थी, जो धूल के रंग की नहीं थी। इसी तरह वे इंग्लैंड की टीमों के स्थानीय संस्कृति को अपनाने के दावे पर कटाक्ष करते हुए कहते हैं कि इसका मतलब अक्सर नजदीकी गोल्फ कोर्स तक जाना होता था। बेरी के विचार संतुलित और सटीक हैं। वे यह भी बताते हैं कि जो लोग खिलाड़ियों के विश्व सीरीज क्रिकेट से पैसा कमाने की आलोचना करते थे, वे खुद पहले से ही समृद्ध थे। उनके विचारों में संवेदनशीलता भी है। उदाहरण के लिए, वे पाकिस्तानी खिलाड़ी मुश्ताक मोहम्मद के बारे में लिखते हैं कि विभाजन के समय की उथल-पुथल के कारण उनकी उम्र के रिकॉर्ड में बदलाव संभव है, और ऐसी परिस्थितियों में एक शरणार्थी को मिलने वाले लाभ को वे उचित ठहराते हैं। बेरी ने सभी टेस्ट खेलने वाले देशों की यात्रा की है। उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक और सामाजिक अंतर पर भी टिप्पणी की है। वे बताते हैं कि भारत में स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार और संस्थागत विकास ने समाज को मजबूत किया, जबकि पाकिस्तान में ऐसे सुधार नहीं हो सके। हालांकि, यह तुलना विवादास्पद भी हो सकती है और यह जरूरी नहीं है कि लेखक के विचारों से सभी सहमत हों।पुस्तक में इंग्लैंड के एशेज मुकाबलों, खासकर 1981 के वर्ष, पर विशेष जोर दिया गया है। हालांकि कुछ जगहों पर लेखक ने अपने व्यक्तिगत क्रिकेट अनुभवों पर थोड़ा अधिक ध्यान दिया है, फिर भी यह पुस्तक बेहद रोचक और ज्ञानवर्धक है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए मेरे मन में एक सवाल उठा-क्या आईपीएल या टी20 क्रिकेट को कवर करने वाले कमेंटेटर कभी ऐसी ही गहराई और रोचकता वाली पुस्तक लिख सकते हैं शायद नहीं। टी20 क्रिकेट अपनी तेज रफ्तार और मनोरंजन के बावजूद, खेल की गहराई और चुनौती को पूरी तरह नहीं दर्शाता। छोटे मैदान, सपाट पिच और गेंदबाजों पर लगी सीमाएं इसे बल्लेबाजों के पक्ष में झुका देती हैं। इसके विपरीत, टेस्ट क्रिकेट में पांच दिन और दो पारियों का प्रारूप खिलाड़ियों की असली क्षमता की परीक्षा लेता है। इसमें पिच और मौसम की विविधता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यही कारण है कि एक सफल टेस्ट खिलाड़ी बनना कहीं अधिक कठिन है। मुझे अपने बचपन के वे दिन याद आते हैं जब मैं रेडियो पर टेस्ट मैच सुना करता था। 1973 में इंग्लैंड और न्यूजीलैंड के बीच एक रोमांचक मैच का वर्णन आज भी मेरे मन में ताजा है। न्यूजीलैंड को जीत के लिए 479 रन चाहिए थे और उन्होंने संघर्ष करते हुए मैच को अंतिम क्षणों तक रोमांचक बनाए रखा। हालांकि वे अंततः हार गए, लेकिन उनका साहस और संघर्ष अविस्मरणीय था।आज, पचास साल बाद भी, मुझे उस मैच की हर प्रमुख घटना याद है, लेकिन क्या आज के आईपीएल मैच भी इतने लंबे समय तक याद रहेंगे शायद नहीं। वे एक के बाद एक आते हैं और जल्दी ही यादों से धुंधले हो जाते हैं। यही टेस्ट क्रिकेट की असली खूबसूरती है- यह सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि धैर्य, कौशल और चरित्र की परीक्षा है। यह हमें यादें देता है जो समय के साथ और भी मूल्यवान हो जाती हैं।इस तेजी से बदलती दुनिया में, जहां सब कुछ तुरंत और तात्कालिक हो गया है, टेस्ट क्रिकेट हमें ठहरकर सोचने, समझने और खेल का वास्तविक आनंद लेने का अवसर देता है। यही कारण है कि इसके प्रति प्रेम कभी कम नहीं होगा।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Apr 05, 2026, 07:11 IST
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