अजीत पवार का जाना: एक नए मोड़ पर पहुंची महाराष्ट्र की राजनीति, एक नए अध्याय की दस्तक

विमान दुर्घटना में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजीत पवार के असामयिक निधन ने न केवल एक कद्दावर नेता को छीना है, बल्कि राज्य की राजनीति की वह धुरी भी हिला दी है, जिसके इर्द-गिर्द विगत तीन दशकों से सत्ता का संतुलन भी घूमता रहा। अजीत पवार की राजनीति की शुरुआत अपने चाचा शरद पवार की छत्रछाया में जरूर हुई, लेकिन अजीत का रास्ता कई बार उनसे अलग और विपरीत भी रहा। शरद पवार जहां धैर्य, संतुलन और दीर्घकालिक रणनीति के लिए जाने जाते हैं, वहीं अजीत पवार त्वरित फैसलों, सत्ता के समीकरणों और व्यावहारिक राजनीति के प्रतीक बने। राजनीति में अपने कॅरिअर की शुरुआत उन्होंने कांग्रेस पार्टी से की, जहां शरद पवार पहले से ही एक शीर्ष नेता थे। जब शरद पवार ने 1999 में कांग्रेस छोड़कर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) का गठन किया, तो अजीत पवार ने भी उनका अनुसरण किया और पार्टी में तेजी से आगे बढ़े। वह महाराष्ट्र से सांसद और विधायक रहे तथा विभिन्न सरकारों में राज्य के उपमुख्यमंत्री के रूप में भी कार्य किया। 2023 में, अजीत अपने चाचा की पार्टी से अलग होकर पार्टी सदस्यों के एक बड़े समूह के समर्थन से राज्य की भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल हो गए। उनके इस विद्रोह ने उन्हें उपमुख्यमंत्री का पद तो दिलाया, लेकिन एनसीपी को दो गुटों में बांट दिया और परिवार के भीतर दशकों से चली आ रही एकता को समाप्त कर दिया। दरअसल, अजीत पवार सत्ता की राजनीति की सबसे यथार्थवादी धारा के प्रतिनिधि थे। हालांकि, भ्रष्टाचार के आरोप, सत्ता के लिए वैचारिक समझौते और पारिवारिक राजनीति की तीखी आलोचना-यह सब उनके राजनीतिक सफर का हिस्सा रहा, लेकिन वह जानते थे कि राजनीति में निष्ठाएं स्थायी नहीं होतीं और नैरेटिव भी बदलते रहते हैं। वह एक अच्छे प्रशासक थे। सहकारी आंदोलन से जुड़ाव और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की समझ ने उन्हें जनता के एक बड़े वर्ग से जोड़े रखा। वह उन नेताओं में से थे, जो आंकड़ों की अहमियत समझते थे और गांव-चौपाल की राजनीति की भी। अजीत दादा, जैसा कि लोग प्यार से उन्हें बुलाते थे, की अचानक विदाई से एनसीपी के दोनों ही गुट असमंजस में तो हैं ही, हालिया नगर निगम चुनावों के दौरान दोनों गुटों के बीच सुलह के मद्देनजर ध्यान देने वाली बात होगी कि राज्य के राजनीतिक समीकरणों में अब क्या बदलाव आते हैं। पुनर्मिलन की भले गारंटी न हो, लेकिन यह तो है ही कि अजीत पवार की मौत से महाराष्ट्र की राजनीति एक नए मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jan 29, 2026, 06:08 IST
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