आज का शब्द: परिमाण और अज्ञेय की कविता- धुँध से ढँकी हुई

'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- परिमाण, जिसका अर्थ है- भार, विस्तार, वह मान जो नाप या तौल के द्वारा जाना जाय। प्रस्तुत है अज्ञेय की कविता- धुँध से ढँकी हुई धुँध से ढँकी हुई कितनी गहरी वापिका तुम्हारी कितनी लघु अंजली हमारी । कुहरे में जहाँ-तहाँ लहराती-सी कोई छाया जब-तब दिख जाती है, उत्कण्ठा की ओक वही द्रव भर ओठों तक लाती है- बिजली की जलती रेखा-सी कण्ठ चीरती छाती तक खिंच जाती है । फिर और प्यास तरसाती है, फिर दीठ धुँध में फाँक खोजने को टकटकी लगाती है । आतुरता हमें भुलाती है कितनी लघु अंजली हमारी, कितनी गहरी यह धुँध-ढँकी वापिका तुम्हारी । फिर भरते हैं ओक, लहर का वृत्त फैल कर हो जाता है ओझल, इसी भाँति युग-कल्प शिलित कर गए हमारे पल-पल -वापी को जो धुँध ढँके है, छा लेती है गिरि-गह्वर भी अविरल । किंतु एक दिन खुल जाएगा स्फटिक-मुकुर-सा निर्मल वापी का तल, आशा का आग्रह हमेम किए है बेकल- धुँध-ढँकी कितनी गहरी वापिका तुम्हारी, कितनी लघु अंजली हमारी । किन्तु नहीं क्या यही धुँध है सदावर्त जिस में नीरन्ध्र तुम्हारी करुणा बँटती रहती है दिन-याम कभी झाँक जाने वाली छाया ही अन्तिम भाषा-सम्भव-नाम करुणा-धाम ! बीज-मन्त्र यह, सार-सूत्र यह, गहराई का एक यही परिमाण हमारा यही प्रणाम ! धुँध-ढँकी कितनी गहरी वापिका तुम्हारी- लघु अंजली हमारी । हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Mar 28, 2026, 16:32 IST
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