देश में डेढ़ करोड़ तो विदेश में हो रही केवल 30 लाख में एमबीबीएस, इसलिए बढ़ा विदेश का रूझान

सिरसा। केंद्र और प्रदेश सरकारों की ओर से विद्यार्थियों को बेहतर और सस्ती शिक्षा देने के दावे किए जाते हैं। लेकिन जो शिक्षा विदेश में 30 लाख रुपये में मिल रही है वह शिक्षा भारत में ली जाए तो उसके लिए अभिभावकों को एक से डेढ़ करोड़ रुपये तक का खर्च उठाना पड़ता है। यही कारण है कि अभिभावक अपने बच्चों को शिक्षा प्राप्त करवाने के लिए यूक्रेन, तजाकिस्तान, रशिया और अन्य देशों में भेजने को मजबूूर होते हैं।यूक्रेन में भी फंसे विद्यार्थी देश से एमबीबीएस की शिक्षा प्राप्त करने के लिए गए थे। लेकिन रूस की ओर से हमला किए जाने के कारण काफी संख्या में विद्यार्थी वहीं पर फंसे हुए है। अभिभावकों का कहना है कि देश में सीटें बहुत कम हैं। जिस कारण बहुत से बच्चे सरकारी सीटों पर दाखिला नहीं ले पाते। अगर उन्हें प्राइवेट विश्वविद्यालय में बच्चों को एमबीबीएस या कोई अन्य कोर्स करवाना हो तो उसके लिए उन्हें एक से डेढ़ करोड़ तक का खर्च उठाने पर मजबूर होना पड़ता। ऐसे में वे उन्हें विदेश भेजने के लिए प्राथमिकता देते हैं।सरकारी सीट पर नहीं हो पाया बेटी का एडमिशन, विदेश में कम था खर्च सुभाष कॉलोनी निवासी इशिका के पिता राजेश गुंबर ने बताया कि उनकी बेटी दो वर्ष पहले यूक्रेन में एमबीबीएस करने के लिए गई थी। हालांकि युद्ध शुरू होने से पहले उनकी बेटी देश में आ चुकी है। गुंबर ने कहा कि नीट में बेहतर प्रदर्शन के बाद भी उसका दाखिला सरकारी सीट पर नहीं हुआ। जब उन्होंने एमबीबीएस के लिए निजी विश्वविद्यालयों में जानकारी ली तो एक वर्ष की करीब 15 लाख रुपये फीस होने की जानकारी मिली। इतना खर्च उठा पाना उनके लिए संभव नहीं था। जब उन्होंने विदेश में इसके बारे में पता किया तो वहां पर कुछ 30 लाख का खर्च होने की जानकारी मिली। जिसके बाद उन्होंने अपनी बेटी को यूक्रेन की लवीब नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी में दाखिला दिलवा दिया।जनसंख्या अनुसार नहीं है सुविधाएंवहीं एमसी कॉलोनी निवासी खुशी की माता मोनिका शर्मा का कहना है कि जनसंख्या के अनुसार देश में कोई भी सुविधा नहीं मिल पाती। भ्रष्टाचार और कम सीटों के कारण लोग अपने बच्चों को विदेश में शिक्षा दिलवाने के लिए भेजते हैैं। देश की यूनिवर्सिटी की फीस और अन्य खर्च भी अधिक हैं। प्रदेश में कुछ निजी विश्वविद्यालय भी ही है जिनमें एमबीबीएस होती है। लेकिन उनका खर्चा विदेश से बहुत अधिक है। जिसके चलते उन्होंने अपनी बेटी खुशी का एडमिशन यूक्रेन की लवीब नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी में करवाया था। लेकिन अब दो वर्ष बाद उन्हें वापस आना पड़ा। अलग-अलग शहरों में फंसे है जिले के कई विद्यार्थी यूक्रेन के लवीब, खारकीव, कीव व अन्य कई शहरों में जिले के सभी विद्यार्थी एमबीबीएस करने के लिए पहुंचे थे। इनमें से कुछ विद्यार्थी ही अभी वापस लौट पाए हैं। जबकि फिलहाल 40 के करीब विद्यार्थी यूक्रेन के अलग-अलग शहरों में फंसे हुए हैं। बमबारी और मिसाइलों के हमले के कारण उनकी जान सांसत में हैं। उन्हें वापस लाने को लेकर सरकार की ओर से प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन अभी तक कई विद्यार्थी हॉस्टलों और रेलवे स्टेशन पर फंसे हुए हैं।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Mar 01, 2022, 23:44 IST
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